रीवा ननि को मंहगा पड़ा प्राइवेट कर्मियों से काम लेना, प्रधानमंत्री आवास योजना की फाइल लेकर गायब हुए कर्मचारी1 min read

Rewa

रीवा। नगर निगम को प्राइवेट कर्मचारियों से काम लेना महंगा पड़ गया। ऐसे ही दो कर्मचारियों ने निगम की फाइलें गायब कर दीं और उन्हें नौकरी से भी हटा दिया गया है। अब इन फाइलों को ढूंढऩे में निगम अधिकारियों की सांसें फूल रही हैं। यदि ये फाइलें नहीं मिलती हैं तो सैकड़ों बेघर गरीबों के आवास का सपना टूट जाएगा। हालांकि उससे निगम प्रशासन को कोई खास फर्क नहीं पडऩे वाला है। पर स्थिति यही रही तो आगामी दिनों में निगम से महत्वपूर्ण डाटा भी लीक हो सकता है। प्राइवेसी को लेकर निगम ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इसके अलावा भी अन्य कार्य निगम प्राइवेट कर्मचारियों से ले रहा है।

मामला प्रधानमन्त्री आवास का

मामला पीएम आवास योजना से जुड़ा है। इसके लिए अनुबंधित एनजीओ कृष्णा प्रेम सार्इं संस्थान सागर के प्राइवेट कर्मचारियों ने घोर अनियमितता की है। कर्मचारियों ने योजना के बीएलसी घटक के तहत हितग्राहियों को लाभ देने में पक्षपात किया है। जिन हितग्राहियों को लाभ नहीं दिया जाना था, उनकी फाइलें ही निगम कार्यालय से गायब कर दी गईं। इस बात की जानकारी निगम अधिकारियों को तब लगी, जब ऐसे मामले सामने आए कि एक ही घर में दो हितग्राहियों को योजना का लाभ दिया गया है। जब तक निगम अधिकारी इस पर सख्ती करते, तब तक काफी देर हो चुकी थी और कर्मचारी अपना काम पूरा कर चुके थे। निगम प्रशासन ने एनजीओ संचालक को नोटिस जारी किया। इसके बाद इन दोनों कर्मचारियों अतुल मिश्रा व राजेन्द्र तिवारी को हटा दिया गया है। बताया गया कि पीएम आवास का पूरा कार्रभार इन्होंने अपने हाथ में ही ले रखा था। आलम यह है कि वर्षों पहले योजना के लिए आवेदन करने वाले हितग्राही अभी भी निगम में भटक रहे हंै और उन्हें कोई जवाब निगम प्रशासन नहीं दे पा रहा है।

10 हजार में होती थी डील

जब निगम अधिकारियों ने इस बात की पड़ताल की तो यह बात भी सामने आई कि एनजीओ के कर्मचारी हितग्राहियों से प्रति किस्त दस हजार रुपये देने की बात पर राजी कर उनकी फाइलें पास कराते थे और उन्हीं हितग्राहियों की फाइलें आगे बढ़ाते थे। जिन हितग्राहियों द्वारा रुपये नहीं दिए जाते थे उनकी फाइलें ही गायब कर दी जाती थीं। यही वजह रही कि बीएलसी के तीन हजार आवेदन आने के बाद भी 1928 हितग्राहियों का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।

पहले भी आया था वसूली का मामला

यह पहली दफा नहीं है, इससे पहले भी निगम अधिकारियो के सामने योजना के एएचपी घटक के तहत एनजीओ कर्मचारी द्वारा फर्जी रसीद देकर 20 हजार रुपये जमा कराने का मामला प्रकाश में आया था। कर्मचारी ने ऐसे हितग्राहियों से करीब 5 लाख रुपये की राशि वसूल डाली थी। इसके बाद निगम अधिकारियों को जब खबर हुई तो उस कर्मचारी को हटाकर पुलिस प्रशासन को सूचना दी गई थी। इसके बाद निगम ने कोई कार्रवाई आगे नहीं की। यही वजह है कि ऐसे कर्मचारियों का हौसला बढ़ता गया और वह अवैध वसूली करने लगे।

अब भी एनजीओ कर रहा काम

इतनी दफा एनजीओ की लापरवाही सामने आने के बाद नगर निगम प्रशासन की मेहरबानी कम नहीं हो रही है। एनजीओ को अब तक निगम ने सिर्फ नोटिस ही जारी किया है। इसके अलावा एनजीओ का भुगतान प्रतिमाह बिना किसी रोकटोक के किया जा रहा है। अभी तक निगम अधिकारियों की इस मेहरबानी का कोई ठोस कारण सामने नहीं आ रहा है।

50 प्रतिशत प्राइवेट कर्मचारी

नगर निगम में इस समय विभागीय काम करने वाले 50 प्रतिशत कर्मचारी प्राइवेट ही है। निगम के जरूरी दस्तावेजों से लेकर विभागीय मेल, डाटा सब कुछ इन्हीं कर्मचारियों की देख-रेख में रहता है। यह कब काम छोड़कर चले जाएं, इसकी कोई जिम्मेदारी कर्मचारियों व निगम अधिकारियों के पास नहीं है। इसलिए हर वक्त निगम में ऐसे कर्मचारियों द्वारा इस प्रकार के मामले प्रकाश में आने की संभावना बनी रहती है।


Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.