डकैत बबली कोल का बाल भी बांका नहीं कर सकी रीवा और यूपी की पुलिस, अपहरणकर्ता का अब तक कोई सुराग नहीं 1

डकैत बबली कोल का बाल भी बांका नहीं कर सकी रीवा और यूपी की पुलिस, अपहरणकर्ता का अब तक कोई सुराग नहीं

Rewa

रीवा : तीन दिन बाद भी सुराग न लगने से परिजनों में बैचेनी है। लेकिन पुलिस के हाथ खाली है। वही परिवार उदास है। किसी अनहोनी की आशंका से परिजनों की आंखों में आंसू हैं। लगातार डकैतों के द्वारा फोन कर रुपए जल्द से जल्द पहुंचाने को कहा जा रहा है, जिससे परिजन व उनके रिश्तेदार भयभीत है। रीवा सतना व चित्रकूट पुलिस के आला अफसरों का जंगलों में डेरा है, ताकि अपहृत को सकुशल छुड़ाया जा सके, पर फिलहाल अन्य अपहरण की घटनाओं की तरह इस बार भी बात बनती नहीं दिख रही है। आसपास दहशत है। पुलिस आश्वासन की गोली देकर परिजनों को ढाढस बंधा रही है,पर अब क्षेत्र में काफी तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं। मप्र उप्र की सीमा पर आंतक के पर्याय बने गैंग पर पुलिस हाथ नहीं डाल पा रही है। शायद इसकी बड़ी वजह है कि कोल बिरादरी कवच बनी हुई है। इलाके में कोलों के गांव जंगलों से लगे हैं जहां उसे पनाह मिलती है। अगर उसने ऐसी ही घुसपैठ जिले में बनाई तो आगे और किसी का भी नंबर लग जायेगा। बबली ने हरसेड गांव में ये वारदात का मतलब है कि उसके लोग वहां हैं या अपहृत के किसी दुश्मन ने उसे बुलाया है।

बबली कोल ने पहले अवधेश द्विवेदी के कामगार को उसके घर से उठाया और फिर उसे आगे कर उनके घर में घुसा। उससे आवाज दिलवाकर दरवाजा खुलवाया मतलब उस तक ये जानकारी पहुंचाई गई कि वो अपने लगुआ की आवाज सुनकर दरवाजा खोल देंगे। अगर बबली को ऐसे ही मददगार मिले तो कब किसे उठा लेगा कुछ कहा नहीं जा सकता । पुलिस से उठ रहा भरोसा डकैतों को मारना और पकडऩा थाने में बैठकर लिखा पढ़ी करने वाले थानेदारों के बस की बात नहीं और न ही चेबर में बैठकर रणनीति बनाने वाले अफसरों के। उसके लिए हाथ मे एके 47 लेकर जंगल मे उतरना पड़ता है और डकैतों के मुकाबले मजबूत मुखबिर तंत्र बनाना होता है जो उनके बारे में सटीक जानकारी दे सके। डकैत की पहुंच कहां तक होती है इसका अंदाजा इसी सर लगा सकते है कि ददुआ के लिए तत्कालीन एसपी आशा गोपालन की मुखबिरी उनका ड्राइवर ही करता था। बिछियन कांड के बाद मझगवां थाने के एक मुंशी से सुंदर पटेल के सबंध उजागर हुए। डकैतों और नेताओं के सबन्ध के तमाम उदाहरण देखने को मिलते रहे है। लिखने का आशय यह है कि हो रही अपहरण की घटनाओं को एक घटना मात्र मान चुप बैठने का समय नहीं है। आम लोगों के साथ राजनेताओं को दबाव बनाना चाहिए कि वो स्पेशल टास्क फोर्स भेजे जो इस डकैत का काम तमाम करे ताकि कल अवधेश जैसा कोई बेकसूर इनका शिकार न बने। बिना फिरौती नहीं छूटा कोई पुलिस के दो साल के आंकड़े बताते हैं डकैतों के चंगुल से छुड़ाने में पुलिस लगातार नाकामयाब रही है ,इसके पीछे मुय कारण रहा है कि पुलिस जंगल में उतरना नहीं चाहती, पुलिस का सर्चिंग अभियान गाडिय़ों में बैठकर चलता है। फोटो खिंचवाने के लिए जंगल में उतरते हैं इसके बाद सायरन बजाती हुई गाडिय़ां निकल आगे निकल जाती है। तत्कालीन रीवा आईजी गाजी राम मीणा के साथ डकैतों के सफाए में शामिल अधिकारियों की मानें तो जब तक पुलिस डकैतों को मारने के लिए उन्हीं की तर्ज पर खून पसीना नहीं पाएगी तब तक मारना संभव नहीं है।

एक अधिकारी ने तो यहां तक कहा कि पुलिस इंतजार करती है कि अपहृत के परिवार फिरौती दें और अपहृत व्यक्ति छूट कर आ जाए। अगर पुलिस का मुखबिर तंत्र और पुलिस मेहनत करें तो डकैतों का सफाया होना कोई बड़ी बात नहीं है । एक अधिकारी ने कहा कि अगर डकैतों को मारना हो है तो घेराबंदी करनी होगी बिना मेहनत वर्तमान पुलिस के बस में डकैतों को मारना संभव नहीं है। पुलिस जंगल में उतरना नहीं चाहती डकैत अपहृत कर फिरौती वसूलने में कामयाब हो जाते हैं। इसका मुय कारण यह भी है कि पुलिस जंगल में उतारकर सर्च अभियान नहीं करना चाहती। रात्रि जंगल में नहीं बिताती बल्कि दिन में सर्च अभियान चलता है और अधिकारी रात में अपने बंगलों में सोते हैं जिसके चलते मजबूरन परिजन अपहृत व्यक्ति को फिरौती देकर छुड़ाता है। पुलिस उन्हें भी नहीं बचा पाई जिनका सगे संबंधियों ने किया था अपहरण संभाग की पुलिस का हाल इसी से जाना जा सकता है कि डकैतों के चंगुल से अपहर्ताओं को बचाने की बात तो दूर उन मासूमों को भी नहीं बचा पाई जिन का अपहरण उनके सगे संबंधित कर फिरौती मांगी थी। चाहे वह अमरपाटन ,नागौद ,चित्रकूट की घटना हो या अन्य। अपहरणकर्ताओं ने मासूमों को मौत के घाट उतार दिया इसके बाद पुलिस आरोपियों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपाती रही है।

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