“सिंधु जल समझौते पर फिर आमने-सामने भारत-पाकिस्तान, हेग कोर्ट के फैसले के बाद जानिए क्या बदला?”

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“सिंधु जल समझौते पर फिर आमने-सामने भारत-पाकिस्तान, हेग कोर्ट के फैसले के बाद जानिए क्या बदला?”

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  • सिंधु जल समझौता क्या है, किन नदियों का पानी किसे मिला, भारत ने संधि क्यों स्थगित की और 2026 में हेग कोर्ट के फैसले पर विवाद क्यों बढ़ा?

ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल हैं—सिंधु जल समझौता क्या है, यह कब हुआ था, इसमें कौन-कौन सी नदियां शामिल हैं, पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है, भारत का इसमें क्या अधिकार है, भारत ने इसे निलंबित क्यों किया और हेग कोर्ट के फैसले पर भारत की क्या स्थिति है? आइए पूरी जानकारी आसान भाषा में समझते हैं।

सिंधु जल समझौता क्या है?

सिंधु जल समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसे 19 सितंबर 1960 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान की सरकारों के बीच किया गया था। विश्व बैंक ने इस समझौते को तैयार कराने और मध्यस्थता की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

समझौते का उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय करना था। भारत के विदेश मंत्रालय के उपलब्ध दस्तावेज में भी 19 सितंबर 1960 की संधि और पूर्वी तथा पश्चिमी नदियों के संबंध में प्रावधान दर्ज हैं।

सिंधु जल समझौते में कितनी नदियां शामिल हैं?

सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियां इस समझौते का हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो समूहों में बांटा गया है—पूर्वी नदियां और पश्चिमी नदियां।

पूर्वी नदियां

  • रावी
  • ब्यास
  • सतलुज

समझौते के तहत इन तीन पूर्वी नदियों के पानी के उपयोग का मुख्य अधिकार भारत को दिया गया। सरकारी जानकारी के अनुसार इन नदियों से औसतन लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट पानी भारत के लिए निर्धारित किया गया था।

पश्चिमी नदियां

  • सिंधु
  • झेलम
  • चिनाब

पश्चिमी नदियों के पानी का मुख्य उपयोग पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत को इन नदियों पर किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं है। संधि में भारत के लिए घरेलू उपयोग, गैर-उपभोगी उपयोग, निर्धारित कृषि उपयोग और कुछ शर्तों के तहत जलविद्युत उत्पादन जैसे अधिकार भी निर्धारित किए गए हैं।

भारत को पश्चिमी नदियों पर क्या अधिकार मिला है?

सिंधु जल समझौते को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि पश्चिमी नदियों का पूरा पानी पाकिस्तान का है और भारत उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता। वास्तव में संधि भारत को कुछ निर्धारित उपयोगों की अनुमति देती है।

भारत पश्चिमी नदियों पर कुछ घरेलू, कृषि और गैर-उपभोगी उपयोग कर सकता है तथा निर्धारित नियमों के अनुसार रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं भी बना सकता है। हालांकि परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से संबंधित कई शर्तें संधि में निर्धारित हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल विवाद क्यों बढ़ा?

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर कई वर्षों से विवाद होते रहे हैं। खासतौर पर जम्मू-कश्मीर में भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने कई बार आपत्ति जताई है। किशनगंगा और रैटल जैसी परियोजनाएं इस विवाद के प्रमुख उदाहरणों में शामिल हैं।

विवाद का एक बड़ा मुद्दा यह रहा है कि भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर बनाई जा रही जलविद्युत परियोजनाएं संधि की शर्तों के अनुरूप हैं या नहीं। पाकिस्तान का आरोप रहा है कि कुछ परियोजनाओं से नदी के प्रवाह और पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जबकि भारत संधि के तहत मिले अपने अधिकारों का हवाला देता रहा है।

भारत ने सिंधु जल समझौता कब निलंबित किया?

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को “abeyance” यानी स्थगित स्थिति में रखने का फैसला किया था। भारत ने इस फैसले को पाकिस्तान के कथित सीमा पार आतंकवाद से जोड़ते हुए कहा कि संधि की स्थिति तब तक बदली नहीं जाएगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से समाप्त नहीं करता।

जुलाई 2026 में विदेश मंत्रालय की ओर से भी भारत का यही रुख दोहराया गया था कि सिंधु जल संधि अभी भी स्थगित स्थिति में है।

2026 में सिंधु जल समझौते पर नया विवाद क्या है?

अगस्त 2026 के अंत में सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद में हेग स्थित Permanent Court of Arbitration की ओर से महत्वपूर्ण फैसला सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार मध्यस्थता पैनल ने माना कि संधि लागू है और भारत को संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए। कुछ परियोजनाओं से जुड़े निर्माण कार्यों को लेकर भी अंतरिम निर्देश दिए गए।

इस फैसले के बाद भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह इस मध्यस्थता प्रक्रिया और फैसले को स्वीकार नहीं करता। भारत का तर्क है कि जिस मध्यस्थता अदालत ने यह कार्यवाही की, उसकी प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र को भारत मान्यता नहीं देता।

हेग कोर्ट के फैसले पर भारत का क्या कहना है?

भारत का कहना है कि संबंधित Court of Arbitration को इस मामले में अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं है। भारतीय पक्ष के अनुसार पाकिस्तान ने संधि में मौजूद विवाद समाधान प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए जिस तरीके से मामला आगे बढ़ाया, वह स्वीकार्य नहीं है।

भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस अदालत को मान्यता नहीं देता और इसलिए उसके फैसले को अपनी संप्रभु नीति या जल परियोजनाओं पर बाध्यकारी नहीं मानता।

पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और जल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान की बड़ी आबादी और कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े जल संसाधनों पर निर्भर है। इसी कारण भारत द्वारा संधि की स्थिति में बदलाव किए जाने के बाद पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सिंधु जल संधि पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और वहां के बड़े कृषि क्षेत्र की पानी की जरूरत इस नदी प्रणाली से पूरी होती है।

क्या भारत पाकिस्तान का पूरा पानी रोक सकता है?

यह सवाल सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहता है, लेकिन इसका जवाब सीधा “हां” या “नहीं” कहना सही नहीं होगा। पानी का प्रवाह केवल किसी एक बांध या परियोजना से नियंत्रित नहीं होता। इसके लिए नदी की भौगोलिक स्थिति, जलाशयों की क्षमता, परियोजनाओं की संरचना, मौसम, वर्षा और उपलब्ध बुनियादी ढांचे जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।

इसके अलावा सिंधु जल संधि में नदियों और पानी के इस्तेमाल से संबंधित विस्तृत तकनीकी प्रावधान हैं। इसलिए “भारत तुरंत पाकिस्तान का पूरा पानी रोक देगा” जैसी सोशल मीडिया पर चलने वाली सरल व्याख्याओं को तथ्य के रूप में नहीं लेना चाहिए।

सिंधु जल समझौते की सबसे बड़ी खासियत क्या रही?

सिंधु जल समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और गंभीर राजनीतिक तनाव के बावजूद यह समझौता दशकों तक जल बंटवारे का आधार बना रहा। 1960 में हस्ताक्षरित इस समझौते ने छह प्रमुख नदियों के पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकारों को व्यवस्थित किया।

हालांकि अब भारत-पाकिस्तान संबंधों में बढ़ते तनाव के कारण इस संधि का भविष्य एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और कूटनीतिक मुद्दा बन गया है।

सिंधु जल समझौते का भारत के लिए महत्व

भारत के लिए सिंधु जल समझौता केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं है। इसका संबंध जम्मू-कश्मीर में जल संसाधनों, जलविद्युत परियोजनाओं, कृषि, ऊर्जा उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ता है।

भारत लंबे समय से यह मुद्दा उठाता रहा है कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार संधि के प्रावधानों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। दूसरी तरफ पाकिस्तान इस संधि को अपने जल सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

सिंधु जल समझौते में विश्व बैंक की क्या भूमिका है?

1960 में हुए सिंधु जल समझौते को तैयार कराने में विश्व बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। संधि में विवादों के समाधान के लिए विभिन्न स्तरों की व्यवस्थाएं भी निर्धारित की गई हैं। इन्हीं प्रक्रियाओं को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के वर्षों में मतभेद सामने आए हैं।

मौजूदा विवाद में भारत ने मध्यस्थता अदालत की प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया है, जबकि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान प्रक्रिया का सहारा लिया।

भारत-पाकिस्तान के लिए सिंधु जल समझौता क्यों महत्वपूर्ण है?

पानी दोनों देशों की अर्थव्यवस्था, कृषि और भविष्य की जल सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। भारत के लिए जम्मू-कश्मीर में जल संसाधनों का उपयोग और ऊर्जा उत्पादन महत्वपूर्ण है, जबकि पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली कृषि और जल आपूर्ति की रीढ़ मानी जाती है।

यही वजह है कि सिंधु जल समझौते पर होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव केवल दोनों देशों के बीच संबंधों को प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि दक्षिण एशिया की रणनीतिक और जल सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है।

सिंधु जल समझौता 2026: आगे क्या हो सकता है?

2026 में सामने आए ताजा घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत और पाकिस्तान इस विवाद को आगे किस दिशा में ले जाते हैं। भारत फिलहाल हेग स्थित मध्यस्थता अदालत के फैसले को स्वीकार नहीं कर रहा है, जबकि पाकिस्तान इस फैसले को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण मान रहा है।

आने वाले समय में कूटनीतिक बातचीत, कानूनी प्रक्रियाएं, जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े विवाद और दोनों देशों की जल नीति इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है। इसलिए सिंधु जल समझौता आने वाले दिनों में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना रह सकता है।

सिंधु जल समझौता: 10 जरूरी बातें

  1. सिंधु जल समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था।
  2. इस पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे।
  3. विश्व बैंक ने समझौते की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  4. समझौते में छह प्रमुख नदियां शामिल हैं।
  5. रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां माना गया।
  6. सिंधु, झेलम और चिनाब पश्चिमी नदियां हैं।
  7. भारत को पूर्वी नदियों के पानी के उपयोग का मुख्य अधिकार मिला।
  8. पश्चिमी नदियों पर भी भारत को संधि के तहत कुछ उपयोग अधिकार प्राप्त हैं।
  9. अप्रैल 2025 में भारत ने संधि को abeyance में रखने का निर्णय लिया था।
  10. अगस्त 2026 के अंत में हेग की मध्यस्थता कार्यवाही के बाद विवाद फिर सुर्खियों में आ गया।

FAQ: सिंधु जल समझौते से जुड़े सवाल

सिंधु जल समझौता कब हुआ था?

सिंधु जल समझौते पर भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर किए थे।

सिंधु जल समझौता किन देशों के बीच है?

यह भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे और उपयोग से संबंधित समझौता है।

सिंधु जल समझौते में कितनी नदियां हैं?

इस समझौते में सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियां—सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज शामिल हैं।

भारत ने सिंधु जल समझौता क्यों निलंबित किया?

भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को abeyance में रखने का फैसला किया था और इसे सीमा पार आतंकवाद से जुड़ी अपनी नीति के साथ जोड़ा था।

क्या सिंधु जल समझौता 2026 में पूरी तरह खत्म हो गया है?

इस विषय पर भारत और पाकिस्तान की स्थिति अलग-अलग है। भारत ने संधि को abeyance में रखने की अपनी स्थिति दोहराई है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कार्यवाही में संधि के लागू रहने की बात कही गई। इसलिए इसे साधारण रूप से “समझौता पूरी तरह खत्म हो गया” कहना सही नहीं होगा।

हेग कोर्ट ने सिंधु जल समझौते पर क्या कहा?

अगस्त 2026 के अंत में Permanent Court of Arbitration की कार्यवाही में संधि के लागू रहने और भारत के दायित्वों को लेकर फैसला सामने आया। भारत ने इस फैसले और अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया।

निष्कर्ष

सिंधु जल समझौता इस समय भारत-पाकिस्तान संबंधों से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण और तेजी से चर्चा में आया विषय है। 1960 में हुए इस समझौते ने छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच व्यवस्था बनाई थी। लेकिन सुरक्षा, आतंकवाद, जलविद्युत परियोजनाओं और बदलती रणनीतिक परिस्थितियों के कारण अब इस समझौते को लेकर विवाद पहले से अधिक गंभीर हो गया है।

अगस्त 2026 में हेग की मध्यस्थता कार्यवाही के बाद भारत द्वारा फैसले को खारिज किए जाने से यह मुद्दा फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। आने वाले समय में भारत की जल नीति, पाकिस्तान की कूटनीतिक रणनीति और जम्मू-कश्मीर की परियोजनाओं से जुड़े फैसले इस विवाद की दिशा तय कर सकते हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों और प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवादों की स्थिति समय के साथ बदल सकती है। सोशल मीडिया पर चल रहे अपुष्ट दावों को तथ्य मानने से बचें।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
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Shashank Dwivedi | रीवा रियासत
सह-संस्थापक एवं वरिष्ठ संपादक • रीवा रियासत

द सिटी एक्सप्रेस के सह-संस्थापक एवं वरिष्ठ संपादक। नीतिगत विश्लेषण, समसामयिक विषयों पर गहन दृष्टिकोण और क्षेत्रीय समाचार समन्वय। डिजिटल मीडिया आचार संहिता व शिकायत निवारण (Grievance Redressal) के प्रभारी।

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