क्यों हो रहा है पर्यावरण प्रभाव आंकलन ड्राफ्ट 2020 का जमकर विरोध, देखिये पूरी रिपोर्ट

क्यों हो रहा है पर्यावरण प्रभाव आंकलन ड्राफ्ट 2020 का जमकर विरोध, देखिये पूरी रिपोर्ट

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क्यों हो रहा है पर्यावरण प्रभाव आंकलन ड्राफ्ट 2020 का जमकर विरोध, देखिये पूरी रिपोर्ट

NEW DELHI: पर्यावरण प्रभाव आंकलन या बहुचर्चित शब्दों में कहें तो EIA ड्राफ्ट 2020, पर्यावरण (संरक्षण) एक्ट,1986 के अंतर्गत आने वाली एक अहम प्रक्रिया है। किसी भी परियोजना का पर्यावरण पर कितना हानिकारक प्रभाव पड़ेगा, इसका आंकलन करने के लिए सन् 1994 में EIA पहली बार वजूद में आया। इसके बाद 2006 अधिसूचना के तहत इसे संसोधित किया गया। दोनों ही बार इस तथ्य को स्पष्ट रखा गया कि पर्यावरण से सीधा सरोकार रखने वाली किसी भी परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) तभी मिलती है जब वे EIA के शर्तों को पूरा करते हैं।

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इस साल मार्च में केन्द्र सरकार द्वारा जारी किए गए EIA ड्राफ्ट में कुछ विवादित बदलाव किए गए हैं जिसका कई पर्यावरणविद विरोध कर रहें हैं। नए ड्राफ्ट में EIA के कुछ प्रमुख नियमों को विवादास्पद तरीके से बदला गया है। पहला अहम बदलाव परियोजनाओं को पोस्ट फेक्टो मंजूरी देने का है। इसका मतलब कोई भी परियोजना, भले ही वह पर्यावरण विरोधी हो, बिना पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए नर्माण कार्य शुरू कर सकती है।

यह फैसला कितना विनाशकारी हो सकता है इसका अंदाजा हाल ही में हुई विशाखापट्नम और असम त्रासदी से लगाया जा सकता है। 7 मई को विशाखापट्नम के एलजी पॉलिमर प्लांट में स्टाइरीन गैस लीक होने की घटना सामने आई थी। जांच में पता चला कि यह प्लांट पिछले दो दशकों से बिना पर्यावरणीय मंजूरी के चल रहा है। ऐसे ही असम के तिनसुखिया जिले में ऑयल इंडिया लिमिटेड में लगी आग ने जान-माल समेत पूरे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया था। राजकीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस मामले में जांच की तो यह पाया कि यह कंपनी पिछले 15 सालों से बिना बोर्ड की मंजूरी के चल रही है।पोस्ट फेक्टो मंजूरी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को अपने फैसले में इसे कानून विरोधी बताया है।

इसके अलावा EIA प्रक्रिया में होने वाली पब्लिक हीयरिंग के समय को 30 दिन से घटाकर अब 20 दिन कर दिया गया है। ये पब्लिक हीयरिंग परियोजना-निर्माण क्षेत्र में रह रहे विभिन्न समुदाय के लोगों के हित में कराई जाती है। साथ ही इस नए ड्राफ्ट में जनता की सह-भागिता को खत्म कर दिया गया है। इसका मतलब यदि किसी परियोजना से पर्यावरण नियमों का उल्लंघन हो रहा हो तो जनता को उसका विरोध करने का अधिकार नही है। ऐसी स्थिति में सिर्फ सरकार और परियोजना निर्माणकरता ही परियोजना का विरोध कर सकते हैं।

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EIA 30 वर्गों के परियोजनाओं के लिए जरुरी है जिनमें खनन, उद्योग, नदी घाटी परियोजनाएं, थर्मल पॉवर प्लांट, आदि प्रमुख हैं। नियमों के बदलाव में स्ट्रेटिजिक मामलों के तहत परियोजनाओं की एक लंबी सूची को EIA की प्रक्रिया से बाहर रखने की बात कही गई है। ड्राफ्ट के अनुसार ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई जानकारी साझा नही की जाएगी। बोर्डर ऐरिया (LAC से 100 की.मी तक) के अंतर्गत आने वाले सभी क्षेत्रों पर बनने वाली परियोजनाओं के लिए वहां रहने वाले लोगों और बाकी जनता की राय अब नही ली जाएगी

कोविद-19 आपदा के चलते यह ड्राफ्ट पहले ही 19 दिन की देरी से प्रकाशित हुआ जिसके बाद केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इसमें पब्लिक फीडबैक(सुझाव) की समय सीमा को 60 दिन से घटा कर 20 दिन कर दिया। इस फैसले के प्रति पर्यावरण हितैषियों ने नाराजगी जताई और कोर्ट से समय सीमा को बढ़ाने की मांग की। मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने फीडबैक की समय सीमा को कम करने के फैसले को रद्द किया और अंतिम तारीख 30 जून से बढ़ाकर 11 अगस्त कर दी है। जनता द्वारा यह सुझाव केन्द्र सरकार की वेबसाइट EIA2020-MOEFCC@GOV.IN पर भेजे जा सकते हैं।

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[रीवा से विपिन तिवारी की रिपोर्ट] 

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