रीवा: RTI और पारदर्शिता के बिना लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

रीवा: RTI और पारदर्शिता के बिना लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल – सूचना आयुक्त राहुल सिंह

मध्यप्रदेश रीवा

रीवा: RTI और पारदर्शिता के बिना लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल – सूचना आयुक्त राहुल सिंह

रीवा ( विपिन तिवारी ) । रविवार को 14वी ज़ूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता में किया गया। जिसमें RTI और न्यायपालिका विषय पर परिचर्चा का की गई। जूम वेबीनार के दौरान पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता एवं समाजसेवी महिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु के साथ एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा, अंबुज पण्डेय, राजीव खरे आदि सैकड़ों आरटीआई कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं प्रबंधन का कार्य सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया।

न्यायालयीन प्रकरणों में किन-किन बिंदुओं पर लगा सकते हैं आरटीआई

इस बीच परिचर्चा का आरंभ करते हुए जबलपुर उच्च न्यायालय के अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट नित्यानंद मिश्रा द्वारा बताया गया कि कोर्ट के प्रकरणों में ज्यादातर नकल लेने का प्रावधान है और नकल की फीस जमा कर जानकारी प्राप्त की जा सकती है लेकिन कई मामलों में सूचना का अधिकार लगाने की प्रक्रिया नहीं है जिसकी वजह से प्रमाणिक दस्तावेज प्राप्त करने में कई कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और आवेदकों को परेशानी का सामना भी करना पड़ता है इसलिए न्यायालय में भी सूचना का अधिकार अधिनियम अपने मूल स्वरूप में लागू किया जाना आवश्यक है। अपने मामले की बात बताते हुए नित्यानंद मिश्रा ने बताया कि उन्होंने जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने के विषय में आरटीआई दायर की थी जिसका निराकरण सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के द्वारा किया गया जिसमें उन्हें काफी समय तक परेशान होना पड़ा था लेकिन अंततः निर्णय प्राप्त हुआ और अब ज्यादातर जानकारी साझा किए जाने का प्रावधान आ रहा है।

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कार्यक्रम के दौरान सतना से एक्टिविस्ट राजीव खरे ने बताया कि उन्होंने कोविड-19 के विषय में सतना जिला चिकित्सालय में आरटीआई दायर की थी जिसमें जीवन और स्वतंत्रता को लेकर 48 घंटे एवं धारा 7(1) के तहत आरटीआई दायर की गई लेकिन कई दिनों बाद भी कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। इसके विषय में सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा कहा गया कि अब आप प्रथम अपील करें और इसके तुरंत बाद द्वितीय अपील सूचना आयोग में प्रस्तुत करें जिसके बाद आयोग द्वारा कार्यवाही की जाएगी।

आरटीआई और पारदर्शिता के बिना लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल – सूचना आयुक्त राहुल सिंह

सूचना आयोग के क्रियाकलापों पर बेवजह स्थगन आदेश दे देना और रिट लगाने की परमिशन देने के विषय में सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा कहा गया इससे आयोग का क्रियाकलाप प्रभावित होता है। सूचना आयुक्त सिंह ने कहा कि वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम आया और इसके उपरांत आज 15 साल का समय व्यतीत होने के बावजूद भी यदि देश की न्यायपालिका न्यायालय व्यवस्थाओं में पारदर्शिता लाने के लिए जद्दोजहद कर रही है और दायर की गई याचिका को लंबे समय तक इंटरटेन किया जा रहा है और जल्द निराकरण नही हो रहे तो इसका तात्पर्य है कि कहीं न कहीं सूचना का अधिकार कमजोर पड़ रहा है।

देश की न्यायालय व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था होती है जिसमें आम जनमानस से लेकर हर व्यक्ति का अंतिम विश्वास होता है। इसी विश्वास के चलते सभी न्यायालय को चाहिए कि सूचना के अधिकार अधिनियम को न्यायालय के हर स्तर पर लागू किया जाए जिससे लोकतंत्र में पारदर्शिता बनी रहे और कोई किसी भी प्रकार का प्रश्न चिन्ह खड़ा न हो। इस विषय में अंतिम सहारा न्यायालय का ही होता है जब उन्हें आम जनता के साथ उनके अधिकारों के प्रति मुस्तैद रहते हुए पारदर्शिता लाने में हर संभव मदद करनी चाहिए।

राज्य सूचना आयुक्त ने बताया की धारा 8(1)(जे) को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट के कई जजों रमन्ना, चंद्रचूर्ण और अन्य के द्वारा अपने अपने निर्णय पारित किए गए जिसमें बताया गया की प्रकरण को केस के आधार पर स्टेट इनफॉरमेशन कमिश्नर या सेंट्रल इनफॉरमेशन कमिश्नर निर्धारित कर सकते हैं और साथ में सुप्रीम कोर्ट का यह भी निर्णय आया कि किसी भी अपीलीय प्रक्रिया में 50 रुपये से अधिक की फीस नहीं लगाई जानी चाहिए। जहां तक सवाल केस आधारित प्रकरणों का है तो इसमें निश्चित तौर पर हर सूचना अधिकारी को यह अधिकार होता है कि वह देखेंत कि कौन सा मामला व्यापक जनहित का है और कौन सा नहीं और यदि कोई मामला व्यापक जनहित का है और जानकारी देना आवश्यक है तो वहां पर न केवल आवेदक को जानकारी दी जानी चाहिए बल्कि ऐसी समस्त जानकारियां पब्लिक पोर्टल पर धारा 4 के तहत साझा की जानी चाहिए।

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मध्य प्रदेश सहकारिता विभाग आरटीआई के दायरे से बाहर नहीं हो सकता – सूचना आयुक्त राहुल सिंह

सहकारिता विभाग पर एक बार पुनः अपनी बात रखते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि जहां तक सवाल मध्य प्रदेश सहकारिता विभाग का है और इससे जुड़ी हुई सहकारी समितियों का है वहां पर निश्चित तौर पर सूचना का अधिकार अधिनियम अपने मूल स्वरूप में लागू किया जाना चाहिए क्योंकि मध्यप्रदेश सहकारिता विभाग में शासन द्वारा कंट्रोल किया जाना और पर्याप्त फंडिंग जो कि राज्य शासन के माध्यम से आम जनता, किसानों और बैंकिंग संस्थाओं की लेनदेन में कभी किसान कर्ज माफी, कभी ब्याज अनुदान, और कभी खाद बीज सब्सिडी के रूप में तो कभी फसल बीमा के रूप में दी जाती है.

उसके आधार पर यह बात तय है कि सहकारी समितियों और सहकारिता विभाग आरटीआई के दायरे में आना चाहिए। क्योंकि सबसे बड़ी बात यह है कि मध्य प्रदेश सरकार की ज्यादातर जनहित की योजनाएं सहकारिता विभाग के द्वारा ही संचालित की जा रही है जिसमें सरकार की सब्सटेंशियल फंडिंग लगी हुई है तो सवाल ही नही उठता की सहकारिता विभाग को आरटीआई के दायरे से क्यों बाहर रखा जाय और भविष्य में सहकारिता विभाग और समितियों में पारदर्शिता लाने विषय में ज्यादा जोर दिए जाने की आवश्यकता है।

सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की इसके विषय में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर अचार्यलु से भी चर्चा की गई है जिसमें पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त का मत है कि कोई भी न्यायालय निर्णय हमेशा ही इंटरप्रिटेशन के लिए खुले रहते हैं और उन्हें अंतिम और अक्षरसः नहीं माना जा सकता। ऐसे सभी निर्णय केस के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं और निश्चित तौर पर आरटीआई से जुड़े ज्यादातर कोर्ट आर्डर में यह बात स्पष्ट रूप से उल्लेखित होती है कि केस का निर्धारण उस केस की परिस्थितियों के आधार पर ही होना चाहिए।

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जब खुद पर बात आती है तो माननीयों के निर्णय बदल दिए जाते हैं – आत्मदीप

न्यायपालिका और आरटीआई के विषय में परिचर्चा पर अपनी बात रखते हुए पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि यह एक आम प्रक्रिया है कि जब कोई निर्णय देना होता है और वह निर्णय खुद से संबंधित नहीं होता तो इसमें अच्छे निर्णय दिए जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि निर्णय पारदर्शी और स्वतंत्र है लेकिन जब खुद पर बात आती है तो निर्णय बदल दिए जाते हैं। आत्मदीप ने न्यायालय प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि यद्यपि काफी न्यायालयीन आदेश सूचना के अधिकार अधिनियम के पक्ष में गए हैं जिसमें 15 दिवस के भीतर अपीलीय प्रकरणों पर एवं सूचना के अधिकार पर निर्णय दिया जाना सम्मिलित है लेकिन जहां तक सवाल न्यायालय में सूचना के अधिकार की मंशा के अनुरूप लागू किए जाने का सवाल है वह अन्य विभागीय कार्यालयों की अपेक्षा धीमा है जिस पर न्यायालय को विचार करने की आवश्यकता है।

परीक्षा पुस्तिका की प्रति देने हाई कोर्ट के अपीलीय अधिकारी के आदेश को किया था निरस्त – आत्मदीप

अपने समय के एक प्रकरण का हवाला देते हुए आत्मदीप ने बताया कि एक बार छतरपुर जिले में एक व्यक्ति के द्वारा अपनी परीक्षा से संबंधित परीक्षा पुस्तिका सूचना के अधिकार आवेदन लगाकर चाही गई थी और जब मामला न्यायालय में पहुंचा तो सत्र न्यायालय के द्वारा आरटीआई के जवाब को घुमाया गया और बताया गया यह निर्णय दिया जाना संभव नहीं है। इस पर आवेदक के द्वारा हाईकोर्ट में प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील प्रस्तुत की गई और तब भी निर्णय अपीलार्थी के विरुद्ध ही गया। इस पर अपीलार्थी ने राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत की जिस पर तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त के द्वारा एक टीम गठित कर सुनवाई की गई और निर्णय अपीलार्थी के पक्ष में पारित किए गए एवं परीक्षा पुस्तिका अपीलार्थी को देने के लिए आदेश दिया गया और हाई कोर्ट के प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश को सूचना आयोग द्वारा खारिज कर दिया गया।

भारत में आरटीआई कानून आम आदमी के लिए नहीं बल्कि एक्टिविस्टों के लिए बनकर रह गया है – शैलेश गांधी

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भारत के सभी सूचना आयोगों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कहीं न कहीं यह आयोग की भी गलती है कि वह आम जनता की अपील को दरकिनार कर सालों साल उन अपीलीय प्रकरणों का निराकरण नहीं करते और मात्र एक्टिविस्टों के द्वारा लगाई जाने वाली थोक की आरटीआई पर दनादन फैसला देते रहते हैं जिसकी वजह से आम आदमी को ऐसा प्रतीत होता है कि आरटीआई कानून आम व्यक्ति का नहीं रह गया है।

जब तक आयोग आम आदमी के आरटीआई प्रकरण पर सुनवाई की गति त्वरित नहीं करेगा तब तक यह कानून आम जनता की पहुंच से दूर ही रहेगा। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है की एक्टिविस्टों के आरटीआई मामलों पर सुनवाई न की जाए लेकिन आम जनता के आरटीआई आवेदनों को लंबा खींचने की बजाए तत्काल निराकरण किए जाने पर समस्त राज्य सूचना आयोग और केंद्रीय सूचना आयोग को ध्यान देने की आवश्यकता है। शैलेश गांधी ने कर्नाटका हाई कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि 45 दिवस के भीतर द्वितीय अपील के प्रकरणों पर निराकरण किए जाने का आदेश उच्च न्यायालय के द्वारा दिया गया है जिस पर उनके द्वारा महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग एवं अन्य सूचना आयोगों को लीगल नोटिस जारी कर सभी अपीलों के निराकरण के लिए 45 दिवस के भीतर कार्यवाही की माग की गई है।

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कोर्ट में सुनवाई में देरी होती है तो इसका मतलब यह नहीं कि आयोग भी सुनवाई में देरी करें – शैलेष गांधी

अपना मत रखते हुए वेबीनार में चर्चा के दौरान पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री गांधी ने कहा कि हमें गलत बातों की नकल नहीं करनी चाहिए। यदि जिला न्यायालय उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में प्रकरणों में देरी होती है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि सभी राज्य सूचना आयोग एवं केंद्रीय सूचना आयोग भी उसी बात की नकल करें और स्वयं भी प्रकरणों में देरी करें। सूचना आयोगों को चाहिए कि वह जनता के लिए तत्पर रहें और अच्छे से अच्छा कार्य करें जिससे ज्यादातर मामलों का निपटारा आयोग स्तर पर ही हो जाए जिससे आम जनता को परेशानी का सामना न करना पड़े और सूचना के अधिकार कानून की मंशा के अनुरूप लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने में मदद मिल सके।

आयोग और सरकार पर दबाव बनाकर ही मामलों का जल्दी निपटारा किया जाना संभव भास्कर प्रभु

वेबीनार के दौरान चर्चा में कई पार्टिसिपेंट्स ने यह जानकारी चाही कि उनके मामलों पर न तो आयोग और न ही लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी समयबद्ध तरीके से निपटारा नहीं कर रहे हैं ऐसे में आवेदकों के लिए क्या रास्ता बचता है? इस बात का जवाब देते हुए माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता भास्कर प्रभु ने बताया की यह पूरे देश की ही प्रक्रिया है और इसका कोई तात्कालिक समाधान उन्हें भी नहीं दिख रहा है।

इसके लिए जनता को और समस्त आरटीआई कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है और जिस प्रकार से उनके द्वारा और उनकी टीम के द्वारा महाराष्ट्र में कर्नाटका हाई कोर्ट और कोलकाता हाईकोर्ट के 45 दिवस के भीतर द्वितीय अपीलीय प्रकरणों के निपटान के विषय में लीगल नोटिस संबंधित राज्य सूचना आयोग को भेजी जा चुकी है और अब संबंधित उच्च न्यायालय में अपील की तैयारी चल रही है ठीक ऐसे ही अन्य राज्यों में भी कार्यकर्ताओं को फॉलो करने की आवश्यकता है। इससे न केवल संबंधित राज्य सूचना आयोग में सामाजिक दबाव बनेगा बल्कि संबंधित राज्य सरकारों पर भी दबाव बनेगा और वह अपीलों के निपटान के विषय में निर्णय लेने के लिए बाध्य होंगी।

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