रीवा में अधिवक्ताओं से मारपीट का आरोप: यातायात थाना प्रभारी पर गंभीर सवाल, पुलिस महकमे में मचा हड़कंप

रीवा में अधिवक्ताओं ने यातायात थाना प्रभारी पर मारपीट और अभद्र व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए हैं। दो घटनाओं के बाद पुलिस प्रशासन में हलचल तेज, निष्पक्ष जांच की मांग।

Update: 2026-01-23 04:18 GMT
  • रीवा में अधिवक्ताओं ने यातायात थाना प्रभारी पर मारपीट और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए
  • 3 अक्टूबर 2025 और 15 जनवरी 2026 की दो घटनाओं का हवाला
  • अधिवक्ताओं ने निलंबन और एफआईआर की मांग की
  • थाना प्रभारी ने सभी आरोपों को बताया निराधार

रीवा में पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच बढ़ता टकराव

रीवा न्यूज़ के लिए यह सप्ताह असामान्य रहा। शहर के यातायात थाना को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ जिसने पूरे पुलिस महकमे और न्यायिक समुदाय को आमने-सामने ला दिया। अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया है कि यातायात थाना प्रभारी अनिमा शर्मा और उनके साथ पदस्थ आरक्षक वेद प्रसाद मिश्राहरिओम पाण्डेय ने उनके साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार किया। इस मामले ने न सिर्फ शहर बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में चर्चा का विषय बना दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम में अधिवक्ता विकास पटेल सामने आए हैं, जिन्होंने अन्य वकीलों के साथ मिलकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में साफ तौर पर कहा गया है कि यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि लगातार चल रहे व्यवहार का परिणाम है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो यह विवाद और गहरा सकता है।

दो घटनाएं, एक ही आरोप

शिकायत में जिन दो घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनमें पहली 3 अक्टूबर 2025 की है। यह मामला पुराने बस स्टैंड क्षेत्र का बताया गया है। अधिवक्ताओं का दावा है कि उस दिन वे किसी प्रकार के यातायात उल्लंघन में शामिल नहीं थे, इसके बावजूद उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया और शारीरिक रूप से धक्का-मुक्की हुई।

दूसरी घटना 15 जनवरी 2026 को प्रकाश चौराहा पर हुई बताई गई है। अधिवक्ताओं के अनुसार, इस दिन भी स्थिति लगभग वैसी ही थी। वे सामान्य रूप से अपनी गतिविधियों में लगे थे, लेकिन यातायात पुलिस की कार्रवाई के दौरान विवाद इतना बढ़ा कि मामला मारपीट तक पहुंच गया। अधिवक्ताओं का कहना है कि दोनों ही बार वे निर्दोष थे।

फर्जी प्रकरण और मानसिक प्रताड़ना का आरोप

अधिवक्ताओं का आरोप यहीं खत्म नहीं होता। उनका कहना है कि पहली घटना के बाद उनके खिलाफ फर्जी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। इससे उन्हें न केवल कानूनी झंझट झेलनी पड़ी, बल्कि मानसिक प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ा। शिकायत के साथ चोटों की तस्वीरें संलग्न की गई हैं, जिन्हें वे अपने आरोपों का प्रत्यक्ष प्रमाण बता रहे हैं।

अधिवक्ताओं का मानना है कि यह सिर्फ व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे न्यायिक समुदाय के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है। उनका कहना है कि जब कानून के रक्षक ही कानून से जुड़े लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे, तो आम नागरिकों की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

“लंबे समय से उग्र व्यवहार” का दावा

शिकायत में यह भी कहा गया है कि यातायात थाना प्रभारी का व्यवहार लंबे समय से उग्र बना हुआ है। अधिवक्ताओं के अनुसार, आए दिन न केवल वकीलों बल्कि आम नागरिकों के साथ भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है। कई लोग खुलकर सामने नहीं आते, लेकिन अंदरखाने यह असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

इसी आधार पर अधिवक्ता विकास पटेल ने मांग की है कि थाना प्रभारी को तत्काल निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हो। उनका कहना है कि यह कदम न केवल न्याय के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए भी अहम होगा।

थाना प्रभारी का पक्ष: “आरोप पूरी तरह निराधार”

इस पूरे विवाद पर यातायात थाना प्रभारी अनिमा शर्मा ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि दोनों ही घटनाओं के समय वे अपने शासकीय कर्तव्यों का पालन कर रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को समझाइश देना और आवश्यक कार्रवाई करना उनका दायित्व है, जिसे वे ईमानदारी से निभा रही थीं।

थाना प्रभारी के अनुसार, कार्रवाई से बचने और विभाग पर दबाव बनाने के उद्देश्य से उनके खिलाफ एकतरफा शिकायत की गई है। उनका कहना है कि न तो किसी अधिवक्ता के साथ जानबूझकर मारपीट की गई और न ही किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार किया गया। वे कहती हैं कि निष्पक्ष जांच में सच्चाई स्वतः सामने आ जाएगी।

पुलिस प्रशासन के लिए चुनौती बना मामला

यह मामला अब वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के संज्ञान में है। एक ओर अधिवक्ताओं का दबाव है, जो इसे न्यायिक सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी का पक्ष भी सामने है। ऐसे में पुलिस प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय हो।

सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर घटनाओं से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और चिकित्सा रिपोर्ट की समीक्षा की जा सकती है। यह तय करेगा कि किस पक्ष के दावे में कितनी सच्चाई है। 

अधिवक्ताओं में आक्रोश, शहर में चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम के बाद रीवा के अधिवक्ताओं में खासा आक्रोश देखा जा रहा है। कई वकीलों का मानना है कि यह सिर्फ दो व्यक्तियों का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को दर्शाता है, जिसमें कानून से जुड़े लोगों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जा रहा।

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