रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल: डॉक्टर साहब की 'छुट्टी' और वार्ड में 'ताला', क्या भगवान भरोसे हैं किडनी के मरीज?
रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डॉक्टर रौनक द्विवेदी की छुट्टी ने मचाया हाहाकार। 8 फरवरी तक नेफ्रोलॉजी वार्ड और आईसीयू बंद, क्या भगवान भरोसे हैं किडनी के मरीज? पूरी रिपोर्ट।
रीवा। विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र कहे जाने वाले रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल से एक विचलित करने वाली तस्वीर सामने आ रही है। जहाँ एक ओर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दम भर रही है, वहीं दूसरी ओर अस्पताल का नेफ्रोलॉजी (किडनी) विभाग 'एक व्यक्ति की अनुपलब्धता' के कारण पूरी तरह पंगु हो गया है। नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष (HOD) डॉ. रौनक द्विवेदी के 8 फरवरी तक छुट्टी पर चले जाने के कारण विभाग के वार्ड और आईसीयू में ताले लटक गए हैं। हालात यह हैं कि गंभीर मरीजों को या तो निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है या फिर बिना इलाज के दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है।
व्यवस्था पर सवाल: एक डॉक्टर की छुट्टी और विभाग बंद?
आश्चर्य की बात यह है कि इतने बड़े सरकारी संस्थान में बैकअप की कोई व्यवस्था नहीं है। जानकारी के मुताबिक, डॉ. द्विवेदी की अनुपस्थिति में कोई भी दूसरा विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं किया गया है। नतीजतन, किडनी से संबंधित गंभीर रोगों से जूझ रहे मरीजों के लिए वार्ड और आईसीयू के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की पूरी व्यवस्था केवल एक डॉक्टर के भरोसे चल रही है? अगर डॉक्टर छुट्टी पर हैं, तो प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की?
डायलिसिस के भरोसे मरीज, लेकिन आपात स्थिति में कौन?
वर्तमान में अस्पताल में डायलिसिस की प्रक्रिया तो तकनीशियनों के भरोसे चल रही है, लेकिन नेफ्रोलॉजी वार्ड और आईसीयू बंद होने से स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यदि डायलिसिस के दौरान या अस्पताल आने वाले किसी मरीज की स्थिति बिगड़ती है, तो उसे संभालने के लिए विभाग में कोई विशेषज्ञ मौजूद नहीं है। तकनीशियन केवल मशीन चला सकते हैं, वे डॉक्टर का स्थान नहीं ले सकते। इमरजेंसी की स्थिति में मरीजों को भर्ती करने के बजाय उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
इंदौर प्रेम और निजी प्रैक्टिस के आरोप
सूत्रों और स्थानीय मरीजों से मिली जानकारी के अनुसार, डॉ. रौनक द्विवेदी का अक्सर इंदौर जाना लगा रहता है, क्योंकि उनकी पत्नी वहां डॉक्टर हैं। पारिवारिक कारणों से बार-बार छुट्टी पर जाना मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। इतना ही नहीं, यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि जब डॉक्टर रीवा में मौजूद होते हैं, तब भी उनका अधिकांश समय सरकारी अस्पताल के बजाय उनके निजी क्लीनिक पर बीतता है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में वे केवल सुबह-शाम राउंड मारकर औपचारिकता पूरी करते हैं और खुद को जिम्मेदारियों से मुक्त कर लेते हैं।
गरीब मरीजों की जेब पर डाका
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण होता है जो निजी अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च नहीं उठा सकते। लेकिन यहाँ वार्ड में ताला लटका देखकर गरीब मरीज और उनके परिजन हताश हैं। मजबूरन, उन्हें भारी कर्ज लेकर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है। यह सीधे तौर पर सरकारी तंत्र की विफलता है जो एक डॉक्टर के निजी जीवन और सुविधा के आगे सैकड़ों मरीजों के जीवन को दांव पर लगा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी और जनता का आक्रोश
इस पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। क्या प्रबंधन को इस बात की जानकारी नहीं थी कि 8 फरवरी तक विभाग में कोई डॉक्टर नहीं होगा? यदि थी, तो समय रहते व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
मरीजों का दर्द:
अस्पताल परिसर में भटक रहे एक परिजन ने बताया, "हम मरीज को गंभीर हालत में लेकर आए थे, लेकिन यहाँ बताया गया कि डॉक्टर साहब 8 फरवरी तक नहीं हैं और वार्ड बंद है। अब हम गरीब लोग कहाँ जाएं? प्राइवेट अस्पताल जाने की हमारी हैसियत नहीं है।"
निष्कर्ष
रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का नेफ्रोलॉजी विभाग आज सरकारी उपेक्षा और एक डॉक्टर की मनमानी का प्रतीक बन गया है। जब तक स्वास्थ्य सेवाओं को 'पर्सनल चॉइस' से ऊपर रखकर 'सार्वजनिक सेवा' के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसी अव्यवस्थाएं आम रहेंगी। क्या सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में संज्ञान लेकर डॉ. द्विवेदी से स्पष्टीकरण मांगेगा या फिर मरीजों को ऐसे ही उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा?