पत्रकारों के खिलाफ कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल का मामला पहुंचा थाने; सिविल लाइंस पुलिस ने दर्ज की FIR, अब जांच में सामने आएगा पूरा सच
रीवा में खुद को बघेली कला का बड़ा चेहरा बताने वाले अविनाश तिवारी से जुड़ा कथित अभद्र ऑडियो विवाद अब पुलिस तक पहुंच गया है। पत्रकारों के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल को लेकर सिविल लाइंस थाना, रीवा में FIR दर्ज की गई है। उपलब्ध प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 296(b) और 352 का उल्लेख है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।
इस पूरे मामले ने एक सीधा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सार्वजनिक जीवन में पहचान बनाने वाला कोई व्यक्ति पत्रकारों के सम्मान और उनकी भूमिका को अपनी मर्जी से तय कर सकता है?
खुद को बड़ा बताने से कोई बड़ा नहीं हो जाता!
बघेली कला और स्थानीय संस्कृति को पहचान दिलाने का दावा करने वाले किसी भी कलाकार से समाज यह उम्मीद करता है कि वह अपनी भाषा, व्यवहार और सार्वजनिक जिम्मेदारी का भी ध्यान रखे। लेकिन जब किसी व्यक्ति से जुड़े कथित ऑडियो में पत्रकारों के खिलाफ अभद्र भाषा इस्तेमाल किए जाने का आरोप सामने आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसी पत्रकार की खबर पसंद नहीं आई, किसी रिपोर्टिंग से नाराजगी है या किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहते—तो अपना पक्ष रखने के कई लोकतांत्रिक तरीके हैं। तथ्यों के साथ जवाब दिया जा सकता है, शिकायत की जा सकती है और गलत खबर होने पर कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है।
लेकिन पत्रकारों के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप सामने आए, तो यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि आखिर असहमति जताने का तरीका यही क्यों चुना गया?
पहचान काम से बनती है, आत्मप्रशंसा से नहीं। सम्मान व्यवहार से मिलता है, केवल बड़े-बड़े दावे करने से नहीं।
पत्रकारिता को कमजोर समझने की भूल भारी पड़ सकती है
पत्रकार समाज की समस्याओं, प्रशासन की कार्यप्रणाली और सार्वजनिक जीवन से जुड़े सवालों को जनता के सामने रखते हैं। पत्रकारिता में भी कमियां हो सकती हैं और पत्रकारों से भी गलतियां हो सकती हैं। किसी खबर पर आपत्ति हो तो उसका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए।
लेकिन किसी पत्रकार या पूरे पत्रकार समुदाय को अपमानित करने की कोशिश किसी भी विवाद का उचित समाधान नहीं है।
इस मामले में कथित ऑडियो को लेकर जो आरोप सामने आए हैं, उनकी जांच होना जरूरी है। यदि ऑडियो में कही गई बातें शिकायत के अनुरूप पाई जाती हैं, तो उनकी कानूनी समीक्षा संबंधित साक्ष्यों और कानून के अनुसार होगी। फिलहाल FIR दर्ज होने को आरोपों के अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कथित ऑडियो विवाद में FIR, अब पुलिस जांच पर नजर
उपलब्ध FIR की प्रति में भारतीय न्याय संहिता की धारा 296(b) और 352 दर्ज दिखाई देती हैं। धारा 296(b) सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य या अश्लील शब्दों से संबंधित अपराध से जुड़ी है, जबकि धारा 352 शांति भंग कराने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने से संबंधित है।
प्राथमिकी में जांच के लिए रामराज चतुर्वेदी, ऑफिशिएटिंग हेड कॉन्स्टेबल, का नाम भी दर्ज दिखाई देता है।
अब महत्वपूर्ण यह होगा कि पुलिस कथित ऑडियो की प्रामाणिकता, उसके पूरे संदर्भ और शिकायत में लगाए गए आरोपों की किस तरह जांच करती है। मामले में गिरफ्तारी या किसी अन्य कार्रवाई की पुष्टि उपलब्ध दस्तावेज से नहीं होती है।
पत्रकारों का सवाल साफ है: असहमति है तो जवाब दीजिए, अपमान क्यों?
पत्रकारिता लोकतंत्र में सवाल पूछने और जनता तक सूचना पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। पत्रकार किसी व्यक्ति की आलोचना कर सकते हैं, उसकी गतिविधियों पर सवाल उठा सकते हैं और जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने ला सकते हैं। इसी तरह पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर आपत्ति होने पर संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार है।
लेकिन असहमति को व्यक्तिगत अपमान में बदल देना किसी भी पक्ष के लिए उचित नहीं है।
इस मामले में भी सवाल केवल एक कथित ऑडियो का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद की मर्यादा का है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। वहीं, यदि आरोपों में कोई तथ्यात्मक अंतर सामने आता है, तो उसे भी निष्पक्षता से जनता के सामने रखा जाना चाहिए।
अब जवाब बयान नहीं, जांच के नतीजे देंगे
रीवा के सिविल लाइंस थाने में FIR दर्ज होने के बाद मामले की जांच महत्वपूर्ण चरण में है। अविनाश तिवारी का पक्ष, पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया और कथित ऑडियो की प्रामाणिकता से जुड़े तथ्य सामने आने के बाद ही पूरे विवाद की तस्वीर स्पष्ट होगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मामला शिकायत से आगे बढ़कर पुलिस तक पहुंच चुका है। अब किसी की छवि, दावे या सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं से नहीं, बल्कि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होगा कि वास्तविक घटनाक्रम क्या था।
पत्रकारों से असहमति रखिए, सवालों का जवाब दीजिए और अपनी बात मजबूती से रखिए—लेकिन सार्वजनिक संवाद में मर्यादा बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।









