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रीवा नगर निकाय चुनाव: दूल्हा-दुल्हन का पता नहीं और बाराती नाचने लगे, चुनाव की तारीख तय नहीं, महापौर की टिकट के लिए सिर फुटौबल शुरू

रीवा। नगर निकाय चुनाव की अभी तक कोई तारीख घोषित नहीं हुई लेकिन इसके पूर्व ही महापौर पद के लिए टिकट के दावेदारों में सिर फुटौबल शुरू हो गई। हराने-जिताने का ताना-बाना अभी से बुना जाने लगा है।
एक पुरानी कहावत है कि दूल्हा-दुल्हन का पता नहीं है और बाराती नाचने लगे। इसी तरह का हाल कुछ रीवा के नेताओं का है। जितने नेता हैं उतने ही टिकट के दावेदार हैं। हर नेता महापौर बनना चाहता है। इतना ही नहीं, इन नेताओं की हुंकार है कि टिकट तो हमें ही मिले, अन्यथा हम उसे जीतने नहीं देंगे। आप यह भी समझ लीजिए कि जीतने किसे नहीं देंगे। विपक्षी पार्टी के उम्मीदार को नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को जीतने नहीं देंगे, ऐसी हुंकार वर्तमान में भरी जाने लगी है। मतगणना के दिन चाहे जमानत भी न बचे लेकिन वर्तमान में महापौर पद का चुनाव जीतने का दम्भ इतना है कि वह इसके लिए जरूरी वोट अपनी जेब में ही लिये घूम रहे हैं।
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अभी तक नहीं कर पाए विजय श्री का वरण
रीवा नगर निगम अंतर्गत हुए महापौर पद के लिए चुनाव में अभी कांग्रेस पार्टी को विजय श्री नहीं मिल पाई है। जितने भी चुनाव हुए उनमें भाजपा को ही विजय मिली है। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेसी नेता सीख लेने में शर्म करते हैं। चुनाव नजदीक आते ही चौराहों पर टिकट के लिए कूदने लगते हैं। जो हाल रीवा में पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं का है उससे नहीं लगता कि आने वाले दिनों में जीत का स्वाद चख पाएंगे। कारण कि चुनाव की तारीख आई नहीं और भी अकड़े हुए हैं।
हाल यह है कि रस्सी कई बार जल चुकी है फिर भी अकड़ नहीं जा रही है। जो लोग कहते हैं कि पार्टी के हम वफादार नेता है। लेकिन उनकी चाल पद्धति को पार्टी को डुबोने में ही लगी है।
पार्टी के अंदर देशभर में जितने नेता होंगे उतने गुट अकेले रीवा में
रीवा की राजनीति के मामले में एक अलग कहानी है। अगर देखा जाय तो देश भर में पार्टी के जितने नेता होंगे उन सब नेताओं का गुट रीवा में जरूर मिल जाएगा। जब भी उनके नेताओं का आना होता है तो वह झंडा लेकर अकेले ही जिंदाबाद करते मानो यह बताते फिरते हैं उक्त नेता के हम बहुत खास हैं। इतना ही नहीं रीवा में स्वयंभू नेताओं की भरमार है। यही कारण अभी हाल ही में एक बड़े नेता रीवा पधारे तो उनसे कुछ स्वयं भू नेता उनसे मिलने अपनी जिंदावाद पहुंच गये जहां दूसरे गुट के लोगों को अच्छा नहीं लगा और आपस में गुत्थम गुत्थ मच गई। वहां उपस्थित वरिष्ठ नेताओं ने मामले को शांत कराया। यह कोई नया मामला नहीं है। यहां स्वयंभू नेताओं की भरमार है और वह आये दिन अपने को नेता बताने के लिए विवाद खड़ा करते रहते हैं।




