उपचुनाव के बाद फिर शुरू हुआ मंत्रीपद के लिए कयासों का दौर, विंध्य के ये नेता प्रबल दावेदार..

उपचुनाव के बाद फिर शुरू हुआ मंत्रीपद के लिए कयासों का दौर, विंध्य के ये नेता प्रबल दावेदार..

मध्यप्रदेश रीवा विंध्य सतना

रीवा। मध्यप्रदेश में 28 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव संपन्न होने के बाद अब भाजपा में खीचातानी का दौर शुरू होने वाला है। ऐसी स्थिति सबसे ज्यादा विंध्य में निर्मित हो सकती है। अभी तक तो उपचुनाव के बहाने रोके रखा लेकिन अब आगे क्या गुल खिलने वाला है यह समय बताएगा।

विंध्य का हर भाजपा नेता पद दावेदार बना हुआ है। समाचार पत्रों में शुभचिंतकों के माध्यम से दावा पेश करने से नहीं चूक रहे हैं। विंध्य के सबसे बड़े दावेदार के रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ल हैं, जिन्हें अनूपपुर सीट में विजय का श्रेय मिल रहा है। तो दूसरी ओर विधायक गिरीश गौतम, नागेंद्र सिंह भी प्रबल हैं।

सतना से पूर्व मंत्री नागेंद्र सिंह नागौद भी मंत्री बनने की रेस में पीछे नहीं हैं। वहीं सीधी विधायक केदारनाथ शुक्ला लगातार दावेदार बने हुए हैं और अक्सर उन्हें मंत्री बनाए जाने के कयासों का दौर चलता रहता है। वहीं युवा विधायक शरदेंदु तिवारी को लेकर भी चर्चाएं शुरू हैं। तो कुंवर सिंह भी कम नहीं हैं। इसी तरह सिंगरौली से रामलल्लू वैश्य वरिष्ठ विधायक हैं।

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विंध्य ने भाजपा को उम्मीद से ज्यादा सफलता दी तो कांग्रेस की उम्मीदों पानी फेरा

विंध्य में भाजपा को 2018 के विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से काफी ज्यादा सफलता मिली जिसमें रीवा जिले की आठों विधानसभा सहित विंध्य में कुल 24 सीटों में धमाकेदार जीत दर्ज की। यही भाजपा की सत्ता में वापसी का केंद्र बिंदु बना फिर भी विंध्य की उपेक्षा हो रही है।

तो दूसरी ओर कांग्रेस को विंध्य से काफी अपेक्षा थी जहां उसे निराशा हाथ लगी और रीवा से एक भी सीट नहीं जीत पाई जिसके कारण कांग्रेस बहुत से पीछे रह गई। ऐसे हालात में रीवा जिले की उपेक्षा बर्दाश्त के योग्य नहीं है लेकिन यह सब राजनीतिक मसले हैं। राजनीति करने वाले ही समझें।

नारायण का अब क्या रुख होगा?

मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी कई पार्टियों में अपनी दमदारी दिखा चुके हैं। वह बीच-बीच में अपनी बात रखते रहते हैं। लेकिन विंध्य की उपेक्षा पर अब आगे क्या कदम उठाएंगे यह वक्त बताएगा।

कांग्रेस सरकार के दौरान उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ बढ़ा था लेकिन इसी बीच कांग्रेस सरकार का पतन शुरू हो गया तो वह साइलेंट हो गये। अब जब चारो तरफ विंध्य की उपेक्षा को लेकर बात हो रही है तो नारायण त्रिपाठी के रुख का इंतजार करना होगा।

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