अध्यात्म

Who Is Shiva: शिव क्या है, शिव कौन हैं इसका जवाब सद्गुरु बड़े अच्छे से समझाते हैं

Who Is Shiva: शिव क्या है, शिव कौन हैं इसका जवाब सद्गुरु बड़े अच्छे से समझाते हैं
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Who Is Shiva: शिव है भी और नहीं भी है, वह बहुत विशाल है और निम्न भी है, वह बहुत सुन्दर हैं और वीभत्स्य भी हैं

Who Is Shiva: सनातन धर्म में देवों के देव महादेव शिव शंकर स्वयंभू का सबसे बड़ा महत्त्व है, इस बार मार्च माह के पहले दिन यानी के एक मार्च को महाशिवरात्रि का महापर्व है. इस त्यौहार की रात्रि में एक अद्भुत अलोकिंग शक्ति का संचार पूरे ब्रम्हांड से होकर गुजरता है, ऐसा माना जाता है कि शिवरात्रि की रात ब्रह्ममुहूर्त में जो कोई ध्यान करता है उसे उस अलौकिक शक्ति का आभास होता है.


हिन्दू धर्म के अलावा कई समुदाय के लोग शिव को मानते हैं, शिव को आप किसी धर्म, जाति, पंथ तक सिमित नहीं रख सकते क्योंकि शिव खुद असीमित और असाधारण हैं. ना तो शिव का कोई आरभं है और ना ही कोई अंत है जैसे ब्रम्हांड। बहुत से लोग शिव को जानना चाहते हैं, समझना चाहते हैं, क्या शिव कोई आकृति हैं या निरंकार हैं? वो ईश्वर हैं? या मन्युष्य रुपी देवता हैं? शिव क्या हैं, कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई, यह सारे सवाल एक शिव भक्त के चित्त में विचरण करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति यह दावा करे की उसने यह समझ लिया है कि शिव क्या है और कौन है तो इसका अर्थ यह है कि या तो वह झूठ बोल रहा है या उसे अभी भी इसका ज्ञान नहीं है. शिव को समझा नहीं जा सकता।

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सद्गुरु कहते हैं कि- जब हम "शिव" कहते हैं, तो इसकेदो मूलभूत पहलू हैं जिनका हम उल्लेख कर रहे हैं। "शिव" शब्द का शाब्दिक अर्थ है, "जो नहीं है।" आज आधुनिक विज्ञान हमें यह साबित कर रहा है कि सब कुछ, कुछ नहीं से आता है (everything comes from nothing and goes back to nothing) और वापस कुछ भी नहीं जाता है। अस्तित्व का आधार और ब्रह्मांड का मौलिक गुण विशाल शून्य है। आकाशगंगाएँ तो बस एक छोटी सी घटना है - एक छिड़काव। बाकी सब विशाल खाली स्थान है, जिसे शिव कहा जाता है। यही वह गर्भ है जिससे सब कुछ पैदा होता है, और वह विस्मरण है जिसमें सब कुछ वापस चूसा जाता है। सब कुछ शिव से आता है और शिव में वापस चला जाता है।


"शिव" शब्द का शाब्दिक अर्थ है, "जो नहीं है।" दूसरे स्तर पर, जब हम "शिव" कहते हैं, तो हम एक निश्चित योगी, आदियोगी या प्रथम योगी, और आदि गुरु, प्रथम गुरु का भी उल्लेख कर रहे हैं।


तो शिव को एक अस्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक गैर के रूप में वर्णित किया गया है। शिव को प्रकाश के रूप में नहीं, बल्कि अंधकार के रूप में वर्णित किया गया है। मानवता प्रकाश की स्तुति करने के बारे में केवल दृश्य तंत्र की प्रकृति के कारण चली गई है जो वे ले जाते हैं। अन्यथा, केवल एक चीज जो हमेशा रहती है, वह है अँधेरा। प्रकाश इस अर्थ में एक सीमित घटना है कि प्रकाश का कोई भी स्रोत - चाहे वह प्रकाश बल्ब हो या सूर्य - अंततः प्रकाश देने की अपनी क्षमता खो देगा। प्रकाश शाश्वत नहीं है। यह हमेशा एक सीमित संभावना होती है क्योंकि ऐसा होता है और यह समाप्त हो जाता है। अंधकार प्रकाश से कहीं अधिक बड़ी संभावना है। कुछ भी जलने की जरूरत नहीं है, यह हमेशा है - यह शाश्वत है। अंधेरा हर जगह है। यह एकमात्र ऐसी चीज है जो सर्वव्यापी है।


लेकिन अगर मैं "दिव्य अंधकार" कहता हूं, तो लोग सोचते हैं कि मैं शैतान उपासक हूं या कुछ और। दरअसल, पश्चिम में कुछ जगहों पर यह प्रचार किया जा रहा है कि शिव राक्षस हैं! लेकिन अगर आप इसे एक अवधारणा के रूप में देखते हैं, तो सृष्टि की पूरी प्रक्रिया और यह कैसे हुआ है, के बारे में ग्रह पर अधिक बुद्धिमान अवधारणा नहीं है। मैं दुनिया भर के वैज्ञानिकों को "शिव" शब्द का उपयोग किए बिना वैज्ञानिक शब्दों में इसके बारे में बात कर रहा हूं, और वे चकित हैं, "क्या ऐसा है? यह ज्ञात था? कब?" यह हम हजारों वर्षों से जानते हैं। भारत में लगभग हर किसान अनजाने में इसके बारे में जानता है। वह इसके पीछे के विज्ञान को जाने बिना भी इसके बारे में बात करता है

शिव इस संसार के पहले योगी हैं


दूसरे स्तर पर, जब हम "शिव" कहते हैं, तो हम एक निश्चित योगी, आदियोगी या प्रथम योगी की बात कर रहे होते हैं, और साथ ही आदि गुरु, पहले गुरु, जो आज हम जिस योग विज्ञान के रूप में जानते हैं, उसका आधार हैं। योग का मतलब सिर के बल खड़े होना या सांस रोककर रखना नहीं है। योग विज्ञान और तकनीक है जो इस जीवन की आवश्यक प्रकृति को जानने के लिए है और इसे इसकी अंतिम संभावना तक कैसे ले जाया जा सकता है.


योग विज्ञान का यह पहला प्रसारण कांति सरोवर के तट पर हुआ, जो हिमालय में केदारनाथ से कुछ मील की दूरी पर एक हिमनद झील है, जहां आदियोगी ने अपने पहले सात शिष्यों के लिए इस आंतरिक तकनीक का एक व्यवस्थित प्रदर्शन शुरू किया, जिसे आज सप्त ऋषि के रूप में मनाया जाता है। यह सभी धर्मों से पहले का है। इससे पहले कि लोग मानवता को इस हद तक खंडित करने के विभाजनकारी तरीकों को विकसित करें जहां इसे ठीक करना लगभग असंभव लगता है, मानव चेतना को बढ़ाने के लिए आवश्यक सबसे शक्तिशाली उपकरण महसूस किए गए और प्रचारित किए गए।

शिव क्या नहीं हैं


दुर्भाग्य से आज अधिकांश लोगों का परिचय भारतीय कलैण्डर कला के माध्यम से ही शिव से हुआ है। उन्होंने उसे गोल-मटोल, नीले रंग का आदमी बना दिया है क्योंकि कैलेंडर कलाकार का केवल एक ही चेहरा होता है। कृष्ण को मांगोगे तो हाथ में बांसुरी रख देंगे। राम को मांगोगे तो हाथ में धनुष रख देंगे। अगर तुम शिव से मांगोगे, तो वह अपने सिर पर एक चाँद लगा देगा, और बस!

हर बार जब मैं इन कैलेंडरों को देखता हूं, तो मैं हमेशा एक चित्रकार के सामने कभी नहीं बैठने का फैसला करता हूं। तस्वीरें ठीक हैं - वे आपको वैसे ही पकड़ लेती हैं जैसे आप हैं। अगर आप शैतान की तरह दिखते हैं, तो आप शैतान की तरह दिखते हैं। शिव जैसा योगी गोल-मटोल क्यों दिखेगा? यदि आप उसे पतला दिखाते हैं तो ठीक है, लेकिन एक गोल-मटोल-गाल शिव - वह कैसा है?

शिव ईश्वर हैं या इंसान


योगिक संस्कृति में शिव को भगवान के रूप में नहीं देखा जाता है। वह एक ऐसे प्राणी थे जो इस भूमि पर चले थे और हिमालय क्षेत्र में रहते थे। योग परंपराओं के स्रोत के रूप में, मानव चेतना के निर्माण में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

शिव क्या हैं

कुछ लोगों के लिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि शिव क्या हैं? शिव कोई आकृति नहीं हैं, शिव सबसे सुन्दर हैं और वीभत्स्य भी हैं, वो हैं भी और नहीं भी हैं, शिव कल्पना भी हैं और वास्तविकता भी हैं, शिव सब कुछ हैं और कुछ भी नहीं भी हैं, शिव इंसानों के भी हैं और दानवों के भी, वो अच्छे भी हैं और विनाशक भी हैं, शिव एक योगी भी हैं और अघोरी भी हैं, शिव सात्विक भी हैं और भांग का भी सेवन करते हैं. शिव शून्य से भी परे हैं. आप शिव को किसी एक भगवान तक सिमित नहीं रख सकते, आप ये नहीं कह सकते की यही शिव है, शिव असाधारण है. या कुछ यूं कहें कि ध्यान मुद्रा में जब आपके चित्त में कोई भी विचार न हो सिर्फ अंधेरा हो जिसमे ऊर्जा का संचार हो वो शिव है.


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