अध्यात्म

Sharad Purnima Vrat Katha: शरद पूर्णिमा की कथा श्रद्धाभाव से सुनने में है बड़ी शक्ति, भक्त के स्पर्स से निर्जीव में आई थी जान

Sharad Purnima Vrat Katha: शरद पूर्णिमा की कथा श्रद्धाभाव से सुनने में है बड़ी शक्ति, भक्त के स्पर्स से निर्जीव में आई थी जान
x
Sharad Purnima Vrat Katha: शरद पूर्णिमा की कथा श्रद्धाभाव से सुनने में है बडी शक्ति, आइये जानते है पूरी कथा।

Sharad Purnima Vrat Katha: शरद पूर्णिमा वर्ष 2021 में 19 अक्टूबर को है। आइये जानते हैं शरद पूर्णिमा व्रत कथा (Sharad Purnima Vrat Katha) के बारे में कहा जाता है किसी समय एक नगर में एक साहुकार रहता था। उसकी दो पुत्रियां थी। दोनो ही उसकी पुत्रियां पूर्णिमा का उपवास रखती थी। बडी बेटी पूर्णिमा (Purnima) का उपवास पूरे विधि-विधान के साथ सम्पन्न करती थी। तो वहीं छोटी पुत्री हमेशा उस उपवास को अधूरा रखती। वह श्रद्धा के साथ व्रत का पालन नहीं करती थी। कुछ समय बाद दोनों का विवाह हुआ। विवाह के बाद बड़ी पुत्री ने अत्यंत सुंदर, स्वस्थ संतान को जन्म दिया। जबकि छोटी पुत्री की कोई नहीं हो रही थी। वह काफी परेशान रहने लगी। उसके साथ-साथ उसके पति और परिजन भी परेशान रहते।

उसी दौरान नगर में एक विद्वान ज्योतिषी आए। पति-पत्नी ने सोचा कि एक बार ज्योतिषी महाराज को कुंडली दिखाई जाए। यह विचार कर वे ज्योतिषी के पास पहुंचे। उन्होंने स्त्री की कुंडली देखकर बताया कि इसने पूर्णिमा के अधूरे व्रत किए हैं इसलिए इसको पूर्ण संतान सुख नहीं मिल पा रहा है। तब ब्राह्मणों ने उसे पूर्णिमा व्रत की विधि बताई व उपवास रखने का सुझाव दिया। इस बार स्त्री ने विधिपूर्वक व्रत रखा। इस बार सेठ की छोटी पुत्री के यहां एक संतान का जन्म हुआ। लेकिन वह पहले के अपूर्ण ब्रत के प्रभाव से वह कुछ दिनों तक ही जीवित रहा।

शिशु की मौत हो जाने के बाद सेठ की पुत्री काफी दुखी हुई। उसे कुछ सूझ नही रहा था। वह काफी दुखी भी थी। ऐसे में एसे एक उपाया सूझा। उसने मृत शिशु को पीठ के बल लिटाकर उस पर कपड़ा रख दिया। बाद में वह अपनी बडी बहन को बुला लाई। बहर को वह बैठने के लिए कहा। बताया जाता है कि वह जैसे ही दिये गये आसन पर बैठने ही वाली थी कि उसके हाथ उस कपड़े को छू गया जहां पर उसका मृत शिशु लेंटा हुआ था। उसके छूते ही बच्चे के रोने की आवाज आने लगी।

उसकी बड़ी बहन को बहुत आश्चर्य हुआ और कहा कि तू अपनी ही संतान को मारने का दोष मुझ पर लगाना चाहती थी। अगर इसे कुछ हो जाता तो बच्चे की मौत का दोष हमें लगता। तब छोटी ने कहा कि यह तो पहले से मरा हुआ था। आपके प्रताप से ही यह जीवित हुआ है। बस फिर क्या था। पूर्णिमा व्रत की शक्ति का महत्व पूरे नगर में फैल गया और नगर में विधि विधान से हर कोई यह शरद पूर्णिमा का उपवास करने लगा।कथा तथा ब्रत के इस प्रभाव को देखकर वहां के राजा ने शरद पूर्णिमा का ब्रत रखने के लिए इसकी राजकीय घोषणा करवाई गई। वह स्त्री भी अब पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत रखने लगी और उसे बाद में अनेक स्वस्थ और सुंदर संतानों की प्राप्ति हुई।

श्रीकृष्ण ने इस दिन रचाया था महारास

इस दिन का महत्व भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा हुआ है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में राधा और गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसलिए इसे रास पूर्णिमा कहा जाता है।

Next Story