अध्यात्म

रीवा: संतान को संपत्ति से अधिक संस्कारों की आवश्यकता है आचार्य श्री कृपा शंकर जी महाराज चित्रकूट धाम

रीवा: संतान को संपत्ति से अधिक संस्कारों की आवश्यकता है आचार्य श्री कृपा शंकर जी महाराज चित्रकूट धाम
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श्रीमन्नारायण छाया ग्राम मढ़ी में श्रीमद्भागवत कथा की बैठकी रविवार को हुई। इस कार्यक्रम का आयोजन भव्य कलश यात्रा के साथ किया गया।

रीवा: श्रीमन्नारायण छाया ग्राम मढ़ी में श्रीमद्भागवत कथा की बैठकी रविवार को हुई। इस कार्यक्रम का आयोजन भव्य कलश यात्रा के साथ किया गया। कथा के प्रारंभ में आचार्य श्री कृपा शंकर महाराज चित्रकूट धाम ने अपनी मधुर वाणी से श्रीमद् भागवत कथा महात्मा के अंतर्गत धुंधकारी चरित्र का वर्णन किया। धुंधकारी कथा के निचोड़ स्वरूप आचार्य श्री ने कहा की आज संतान को संपत्ति से अधिक संस्कारों की आवश्यकता है। बिना संस्कार के संतान या कहा जाए तो इंसान पशु के समान होता है। संस्कार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और उन्हें जीवन में एक सफल व्यक्ति बनाते हैं।


पुण्य उदय होने पर होती है भागवत कथा : हरिवंशाचार्य जी महराज

मुख्य कथा श्रोता शिवदत्त तिवारी एवं कुसुम तिवारी के परम पूज्य गुरु हरिवंशाचार्य जी महाराज ने भागवत कथा के संबंध में कहा कि जब कई जन्मों के पुण्य उदय होते हैं तब भागवत कथा का आयोजन आयोजक द्वारा किया जाता है। हरिवंशाचार्य जी महाराज ने सूक्ष्म तौर पर कथा के संबंध में कहां और अपने यजमानों को शुभ आशीर्वाद प्रदान किया।


गर्भ में भी मिलता है संस्कार

आचार्य श्री ने बताया की बालक को संस्कार गर्व से ही शुभारंभ हो जाते हैं । साथ ही उन्होंने कहां की मां के समान कोई गुरु नहीं होता। अगर मां चाहे तो जीव के गर्भ में आते ही अपनी संतान को शिक्षा देना शुरू कर दे। उन्होंने कहा की जब गर्भ में शिशु होता है उस समय मां को चाहिए रामायण भागवत एवं गीता सद ग्रंथों का श्रवण करें भारतीय वीरों के चरित्रों का पठन श्रवण करें। इससे नवजात में संस्कारों का उदय शुरू हो जाता है।


भागवत महात्म कथा

प्रथम दिवस की कथा में महाराज श्री ने बताया श्रीमद् भागवत एवं राम कथा दुनिया की सबसे बड़ी पाठशाला है। जिसमें जीवन जीने का अनुभव प्राप्त होता है। इसलिए बुजुर्गों से अधिक आज की युवा पीढ़ी को विद्यार्थी को बेटे एवं बेटियों को कथा सत्संग सुनने की आवश्यकता है।


आचार्य श्री ने बताया आज की शिक्षा पाश्चात्य पाठ्यक्रम पर आधारित केवल पेट भरने की ही पद्धति प्रदान करती हैं पूर्व काल में जो गुरुकुल की शिक्षा होती थी वह समाज सेवा परिवार सेवा राष्ट्र सेवा सिखाती थी। इसलिए प्रत्येक पिता का कर्तव्य है कि कॉन्वेंट शिक्षा के साथ भारतीय संस्कारी शिक्षा भी प्रदान अवश्य करे।

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