अध्यात्म

पढ़ेंगे तो जरूर कुछ न कुछ मिलेगा, जीवन में हमने क्या पाया क्या खोया

News Desk
1 May 2021 6:51 PM GMT
पढ़ेंगे तो जरूर कुछ न कुछ मिलेगा, जीवन में हमने क्या पाया क्या खोया
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प्रकृति ने दो तरह के इंसान बनाये हैं। एक जो सब कुछ पाकर भी मांगता ही रहता हैं और एक कुछ नहीं हो तो भी किसी मजबूर की मदद को तैयार रहता हैं । जो हमेशा मांगता रहता है उसे ईश्वर का अभिशाप मिला है और जो देते रहता है वो ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त किये हुए है। जिसके पास सब कुछ रहते हुए भी देना नहीं चाहता वह अपने लिए पाप एकत्र करता है। ईश्वर ने हम सबको कुछ ना कुछ दिया है पर हम ज्यादा पाने की लालसा मे जो मिला उसका आनन्द नही ले पाते। जैसे आपका एक दांत टूट जाए तो उस खाली जगह पर ही आपकी जुबान जाती हैं बाकी 31 दांत को हम भूल जाते हैं ।

प्रकृति ने दो तरह के इंसान बनाये हैं। एक जो सब कुछ पाकर भी मांगता ही रहता हैं और एक कुछ नहीं हो तो भी किसी मजबूर की मदद को तैयार रहता हैं । जो हमेशा मांगता रहता है उसे ईश्वर का अभिशाप मिला है और जो देते रहता है वो ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त किये हुए है। जिसके पास सब कुछ रहते हुए भी देना नहीं चाहता वह अपने लिए पाप एकत्र करता है। ईश्वर ने हम सबको कुछ ना कुछ दिया है पर हम ज्यादा पाने की लालसा मे जो मिला उसका आनन्द नही ले पाते। जैसे आपका एक दांत टूट जाए तो उस खाली जगह पर ही आपकी जुबान जाती हैं बाकी 31 दांत को हम भूल जाते हैं ।

घमण्ड न करें

जब हम फसल बोते हैं तो प्रकृति एक दाने से 100 गुना बढ़ाकर देती है। अब हम क्या बो रहे हैं ये हमारे ऊपर हैं । जब हम किसी की मदद करते हैं, किसी को जरूरत के समय काम आते हैं, तो ये घमण्ड ना करें कि हम कर रहे हैं, बल्कि ये कहकर नम्र रहे की भगवान ने हमें मदद के लिए चुना है। धार्मिक कार्यों में यदि हम सहायता करते हैं तो भगवान का उपकार समझिए कि ईश्वर ने हमे इसके योग समझा ।

जो बोया वही काटोगे

क कहानी के माध्यम से आपको अपनी बात कहूं। इसके पहले एक बात बता रहा हूं। जब हम किसी को दान देते हैं तो जो हल्का से हल्का सामान हो, वो देते हैं। जब हम मन्दिर में चावल भगवान को अर्पित करते हैं तो 20 रूपये किलो वाले चढ़ाते हैं और खुद ऊंचा खाते हैं । गाय को एक दिन पुरानी बिना घी की रोटी देते है, खुद ताज़ी घी लगाकर खाते हैं । धार्मिक कार्यो में दान देते समय हम कंजूसी करते हैं । अब आप सोचो की आप क्या बो रहे हो और क्या काटोगे।

ऐसे समझें

एक बार एक संत ने अपने दो भक्तों को बुलाया और कहा आप को यहां से पचास कोस दूर जाना है। एक भक्त को एक बोरी खाने के सामान से भर कर दी और एक को ख़ाली बोरी दी उससे कहा रास्ते मेंजो उसे अच्छा मिले उसे बोरी में भर कर ले जाए । दोनों निकल पड़े। जिसके कंधे पर सामानथा वो धीरे चल पा रहा था, खाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था। थोड़ी दूर उसको एक सोने की ईंट मिली उसने उसे बोरी मे डाल लिया, थोड़ी दूर चला फिर ईंट मिली उसे भी उठा लिया।जैसे -जैसे चलता गया उसे सोना मिलता गया और वो बोरी में भरता हुआ चल रहा था और बोरी का वजन बढ़ता गया, उसका चलना मुश्किल होता गया और सांसद भी भरने लगी। अब कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा था।

दूसरा भक्त जैसे -जैसे चलता गया रास्ते में जो भी मिलता उसको बोरी में से खाने का कुछ सामान दे देता। धीरे-धीरे उसकी बोरी का वजन कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। मतलब जो बांटता गया उसका मंजिल तक पहुंचना आसान होता गया और जो इकट्ठा करता रहा तो वह रास्ते में ही दम तोड़ दिया। जब वापसी हुई तो जो बांटता गया उसको सोने की ईट मिल गई और अपनी बोरी में रख लिया और जो समेटता गया वो दुनिया से चला गया। दिन से सोचना हमने जीवन में क्या बांटा और क्या इकट्ठा किया। हम मंजिल तक कैसे पहुंच पाएंगे।

समझें मेरा अभिप्राय यह नहीं कि आप कमओ और दूसरों को बांटते जाओ बल्कि मतलब है कि आप ईश्वर द्वारा चुने आशीर्वाद हो, जो मदद के लिये खड़े हो, देने वाला भगवान होता और आप किसी के लिये भगवान का प्रतिरूप बन सकते हो। आप भगवान के कार्यो को पूर्ण करने में सहयोग कर सकते हो, यही सुकर्म आपको फलीभूत होगा।

  • आचार्य भूपेंद्र मिश्र, प्रवक्ता श्रीमद्भागवत कथा
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