सिंगरौली

Shriniwas Tiwari 2nd Death Anniversary Special: 'दादा न होय दऊ आय', पहली बार इन्होने बुलाया था 'White Tiger'

Aaryan Dwivedi
16 Feb 2021 6:12 AM GMT
Shriniwas Tiwari 2nd Death Anniversary Special: दादा न होय दऊ आय, पहली बार इन्होने बुलाया था White Tiger
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आर्यन द्विवेदी, रीवा। ( Shriniwas Tiwari ) विंध्य को देश के राजनीतिक नक्शे में नई पहचान दिलाने वाले जनता के 'दादा' की आज 19 जनवरी को द्वितीय

आर्यन द्विवेदी, रीवा। ( Shriniwas Tiwari ) विंध्य को देश के राजनीतिक नक्शे में नई पहचान दिलाने वाले जनता के 'दादा' की आज 19 जनवरी को द्वितीय पुण्यतिथि है। किसान, मजदूरों का हक दिलाने के लिए सामंतवाद के खिलाफ लड़ाई लडऩे वाले श्रीनिवास तिवारी अब इतिहास बन चुके हैं। लेकिन, उनसे जुड़ा प्रदेशभर में चर्चित चुनावी नारा 'दादा न होय दऊ आय, वोट न देहा तऊ आय' हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया है।

दादा समूचे विंध्य के लिए एक पालक थें, वे विंध्य से कभी दूर नहीं जाना चाहते थें इसलिए उन्होंने केंद्र की राजनीति से तौबा कर रखा था फिर भी वे किसी केंद्रीय स्तर के नेता से कम न थें। शख्शियत ऐसी की बड़े बड़े नेता तक मिलने आते थें। शुरू से ही तेज तर्रार दादा की इसी अदा पर फ़िदा होकर पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी ने पहली बार दादा को 'White Tiger' कहकर पुकारा था। इसके बाद से ही दादा 'White Tiger' के नाम से विख्यात हो गए।

19 जनवरी 2018 का वो दिन जब दादा की आखिरी सांस ने मानो सारे विंध्य की सांस रोक दी थी, बच्चा-बच्चा अपने दादा के लिए रोया था। मानों किसी ने अपना पिता खो दिया, तो किसी ने अपना गुरु।

एक साधारण किसान परिवार में जन्मे 'दादा' ने न सिर्फ रीवा, बल्कि विंध्य के विकास में अपना जो योगदान दिया वह अविस्मरणीय रहेगा। रीवा को विकास के रास्ते पर लाने और देश में अलग पहचान दिलाने वाले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी ने विंध्य प्रदेश को कई सौगातें दीं। उनका जन्म 17 सितंबर 1926 को तिवनी ग्राम के किसान मंगलदीन तिवारी के घर हुआ था।

माता कौशिल्या देवी थीं। सतना जिले के झिरिया ग्राम के रामनिरंजन मिश्र की बेटी श्रवण कुमारी से विवाह हुआ। उनके दो पुत्र अरुण एवं सुंदरलाल तिवारी हुए। दोनों अब नहीं रहे। अरुण के बड़े पुत्र विवेक तिवारी जिपं सदस्य रह चुके हैं। छोटे पुत्र वरुण युवा कांग्रेस के नेता हैं। श्रीनिवास ने शिक्षा मनगवां बस्ती के विद्यालय से आरंभ की। सन 1950 में दरबार कालेज रीवा से एलएलबी एवं 1951 में हिन्दी साहित्य से एमए किया। छात्र जीवन से राजनीति की।

जब विस में बना लिया था सचिव
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी वर्ष 1993 में पहली बार जब विस अध्यक्ष बने तो कटनी के तत्कालीन नगर पालिक अधिकारी रहे सत्यनारायण चतुर्वेदी को विधानसभा में सचिव बना लिया था। तत्काल प्रभाव से कमलाकांत को कार्यक्रम अधिकारी बना लिए थे। राजस्व प्रकरणों के लिए जगजाहिर तिवारी को जिम्मेदारी सौंपी थी, खास बात यह रही कि पूर्व अध्यक्ष तत्कालीन कलेक्टर को राजस्व प्रकरणों के निर्देश के बाद आरआरई रहे जगदीश तिवारी से समझने के लिए कहते थे।

राजनीति के 'पंडित' थे श्रीयुत
- चुनाव नहीं लडऩे की उम्र में चुनाव लड़े और जीता, मामला हाई कोर्ट पहुंचा जहां कुंडली लगाकर उम्र साबित की।
- पहले चुनाव में विंध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष यादवेंद्र सिंह से लड़े, वह जीतते तो सीएम होते। उन्हीं से राजनीतिक सीख चुनाव के समय भी लेते रहे।
- स्वास्थ्य मंत्री रहते शिक्षा विभाग की फाइल में हस्ताक्षर कर दिया। सवाल उठा तो बोले कैबिनेट मंत्री की शपथ ली है, किसी एक विभाग की नहीं।
- मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के खिलाफ आवाज उठाते हुए कहा कि वह भी मंत्री की तरह विधायक हैं, सब कुछ नहीं हो सकते।
- विधानसभा अध्यक्ष रहते कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी भी रहे, कहा कि पार्टी की वजह से विधायक बना और विधानसभा अध्यक्ष। ऐसा करने वाले इकलौता विधानसभा अध्यक्ष रहे।
- देश में पहली बार विधानसभा के भीतर मुख्यमंत्री प्रहर कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें सीएम को अनिवार्यरूप से जवाब देना होता था।
- दस वर्ष के विधानसभा अध्यक्ष कार्यकाल में विधायक डॉ. सुनीलम के अलावा किसी पर मार्शल का उपयोग नहीं किया।

चर्चा में रहे तिवारी के यह बयान
- विंध्य प्रदेश की जनता का मौलिक अधिकार है कि वह अपने भाग्य का निर्णय कर सकें।
- अर्जुन सिंह से मतभेद था, मनभेद नहीं।
- जवानी उम्र से नहीं भावनाओं से आंकी जाती है।
- हमारी सहमति से प्रत्याशी चयन नहीं तो उसके लिए वोट नहीं मांग सकता।
- राजीव गाँधी की सिरमौर चौराहे की प्रतिमा को तोड़ा तो अपने दीनदयाल को नहीं बचा पाएगी भाजपा।
- हां प्रदेश में कांग्रेस की समानांतर अमहिया सरकार है और मैं उसका सीएम हूं।
- तिवारी ने आरोप लगाते हुए कहा था कि भाजपा सरकार से मिली भगत से काम कर रहे कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष।

सफरनामा ( Shriniwas Tiwari Life History )
- जन्म-17 सितंबर 1926
- जन्म स्थान- ग्राम शाहपुर ननिहाल
- गृहग्राम- तिवनी
- माता- कौशल्या देवी
- पिता- पं. मंगलदीन तिवारी
- प्रारंभिक शिक्षा- तिवनी, मनगवां एवं मार्तंड स्कूल रीवा
- उच्च शिक्षा- एमए, एलएलबी, टीआरएस कालेज रीवा
- राजनीति में प्रवेश: छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी, सामंतवाद के विरोध मेंं कार्य
- विधायक : 1952, 1957, 1972 से 1985, 1990 से 2003 तक लगातार
- प्रदेश सरकार में मंत्री : 1980
- विस उपाध्यक्ष: 23-3-90 से 15-12-92
- अध्यक्ष विधानसभा: 1993 से 2003 तक
- उपलब्धियां : राजनीति, समाजसेवा, प्रशासन एवं साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य


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श्रीनिवास तिवारी रीवा से लेकर भोपाल दिल्ली तक यथार्थ से ज्यादा किंवदंती के जरिए जाने गए. दंतकथाएं और किंवदंतीयां ही साधारण आदमी को लोकनायक बनाती हैं. विंध्य के छोटे दायरे में ही सही तिवारीजी लोकनायक बनकर उभरे और रहे. मैंने अबतक दूसरे ऐसे किसी नेता को नहीं जाना, जिनको लेकर इतने नारे, गीत-कविताएं गढ़ी गईं हों. सच्चे-झूठे किस्से चौपालों और चौगड्डों पर चले हों. उनकी अंतिमयात्रा में उमड़ा जनसैलाब इन सब बातों की तस्दीक करता है.

राजनीति उनके रगों में थी या यूं कहें कि उनका राजनीतिक जुड़ाव जल व मीन की भांति रहा. वे अच्छे से जानते थे कि इसे कैसे प्रवहमान बनाए रखा जाए. वे जितने चुनाव जीते लगभग उतने ही हारे, लेकिन उन्होंने खुद को हारजीत के ऊपर बनाए रखा. कविवर सुमन की ये कविता- 'क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथपर जो मिले यह भी सही वह भी सही.. अटल बिहारी वाजपेयी की जुबान से निकलने के पहले उनकी जुबान से सन् 1985 में तब निकली थी जब अर्जुन सिंह ने उनकी टिकट काट दी थी और अमहिया में 20 से 25 हजार समर्थकों की भीड़ उनपर यह दवाब बनाने के लिए डटी थी कि वे कांग्रेस से बगावत करके न सिर्फ लड़ें, अपितु विंध्य की सभी सीटों से अपने उम्मीदवार खड़ा करके कांग्रेस को सबक सिखाएं. उन्होंने समर्थकों को यह कहते हुए धैर्य रखने को कहा कि कांग्रेस का मतलब अकेले अर्जुन सिंह थोड़ी न है और भी बहुतकुछ हैं. देखते जाइए... और फिर 1985 में अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दूसरे दिन जब राजीव गांधी ने उनसे इस्तीफा लेकर पंजाब का राज्यपाल बनाया तब उनके समर्थकों को तिवारी जी के कहे का मतलब समझ में आया और यह वाकया भी दंतकथाओं में चला गया. अर्जुन सिंह का इस्तीफा लिए जाने के पीछे तिवारीजी की कोई भूमिका रही हो या न रही हो, पर किसी घटनाक्रम को राजनीति में अपने हिसाब से कैसे मोड़ा जा सकता है तिवारीजी से बेहतर कोई नहीं जानता. यद्यपि प्रचंड विरोध के बाद भी अर्जुन सिंह से उनके संवाद निरंतर कायम रहे. तिवारीजी कहा करते थे प्रतिद्वंद्विता में संवादहीनता स्थायी दुश्मन बना देती है और राजनीति में न कोई दोस्त होता है और न दुश्मन. समय के साथ भूमिका बदलती रहती है. आगे दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ भी. 1993 में तिवारीजी श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम के अगुआ थे, लेकिन बन गए दिग्विजय सिंह और बाद में प्रदेश ने दिग्विजय सिंह तिवारीजी की युति को भी देखा और दोस्ती को भी.

तिवारीजी को आमतौर पर समाजवादी नेता के तौर पर देखा जाता था. वर्ष 1972 में कांग्रेस में आने के बाद गांधीवादी भी हो गए, ऐसा लोग मानते हैं. हकीकत तो यह है कि तिवारीजी न समाजवादी थे न गांधीवादी. वे यथार्थवादी थे. वे अपने वाद के खुद प्रवर्तक थे. उनके आदर्श का खुद का अपना पैमाना था. कभी भी किसी भी इंटरव्यू में न तो उन्होंने लोहियाजी को अपना आदर्श माना और न ही गांधीजी को. वे अपने आदर्श की खोज जनता के सैलाब में करते थे. उनका आदर्श कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि भाव था और वह भाव था जनता-जनार्दन. जनता-जनार्दन कहने वाले तो आज भी बहुतेरे हैं पर उसे वाक्‍य जनार्दन मानने वाले वे विरले नेता थे. हां, उन्‍होंने अपने नेता के रूप में जिंदगी में सिर्फ दो लोगों को स्वीकार किया. इनमें एक थे जगदीश जोशी, जिनकी बदौलत वे सोशसलिस्टी हुए, दूसरीं- इंदिरा गांधी, जिनके भरोसे वे कांग्रेस में शामिल हुए.

कांग्रेस में रहते हुए भी सभी समाजवादी उन्हें अपनी बिरादरी का मानते रहे, लेकिन ये बात बहुत कम लोगों को ही मालूम होगी कि उनकी डॉक्‍टर लोहिया से कभी नहीं पटी. इसकी वजह यह थी कि तिवारीजी लोहिया को भी तड़ से जवाब देने से नहीं चूकते थे. दो उन्‍होंने घटनाएं मुझसे साझा की थी. पहली वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव की थी. लोकसभा के चुनाव में सीधी संसदीय क्षेत्र से भगवानदत्त शास्त्री को सोशलिस्ट पार्टी से उतारा गया था. शास्त्री जी को सिंबल मिला, उन्होंने पर्चा भी दाखिल कर दिया. इसी बीच लोहियाजी को क्या सूझी कि वे कानपुर के एक उद्योगपति सेठ रामरतन को लेके आ गए और कहा सीधी से सोपा की टिकट पर अब ये लड़ेंगे. लोहिया के फैसले को चुनौती देना उन दिनों सोशलिस्टों के लिए भगवान को चुनौती देना था. साथियों की रोकटोक के बाद भी तिवारीजी ने कहा हम डॉक्‍टर साहब का फैसला नहीं मानेंगे. ये क्या बात हुई दिनभर सेठ साहूकारों, जमीदारों के खिलाफ बोलो और रात को सेठों से समझौता... ऐसा नहीं होगा.

तय हुआ कि शास्त्रीजी पर्चा वापस लें और रामरतन सोपा के उम्मीदवार बनें. सहज शास्त्री तो तैयार बैठे थे. पर जिस दिन पर्चा खींचने की बात आई तो तिवारी सीधी पहुंचे. एक साईकिल जुगाड़ी. किसी बहाने शास्त्रीजी को साइकिल के डंडे पर बैठाया और उन्हें लेकर जंगल की तरफ चले गए. जब पर्चा खींचने की मियाद खत्म हुई तभी वे उन्‍हें लेकर लौटे. कल्पना कर सकते हैं कि लोहियाजी का गुस्सा कैसे रहा होगा पर राजनीति में करियर बनाने के दिनों में तिवारीजी के ये तेवर थे. किसी ने पूछा- ऐसा क्यों किया? तो तिवारीजी ने जवाब दिया चुनाव जनता जिताती है, लोहिया नहीं. खैर, लोकसभा के पहले आम चुनाव में सीधी लोकसभा सीट से भगवानदत्त शास्त्री जीते, लोहियाजी के सेठ रामरतन नहीं. जबकि लोहियाजी ने भी सभाएं की थीं व शास्त्रीजी से रामरतन को वोट देकर विजयी बनाने की अपील भी करवाई.

दूसरा वाकया था, जब मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो विधानसभा में सोपा विधायक दल का नेता कौन हो? लोहियाजी का विचार था कि पिछड़े वर्ग से आने वाले बृजलाल वर्मा हमारे दल के नेता बनें. तिवारी यद्यपि 1956 का चुनाव हार चुके थे फिर भी उन्होंने लोहियाजी से खुले मुंह कहा, नेता तो जगदीश जोशी होंगे. हम जाति के सवाल पर योग्यता की बलि नहीं चढ़ने देंगे. डॉक्‍टर लोहिया तुनुककर चले गए. इधर जोशीजी को ही सोपा विधायक दल का नेता चुना गया. लोहियाजी इतने खफा हुए कि तिवारीजी को सभी समितियों से निकाल बाहर किया पर तिवारी तो तिवारी ही थे. दुस्साहसी, निश्चय के पक्के दृढ़ चट्टान की भांति अड़े रहने वाले.

राजनीतिक प्रतिबद्धता कोई तिवारीजी से सीखे. जहां रहो आखिरी सांस तक उसी को जियो और यदि त्याग दिया तो- तजौ चौथि के चंद की नाईं. विंध्यप्रदेश की विधानसभा में जमींदारी उन्मूलन, ऑफिस ऑफ प्रॉफिट तथा विलीनीकरण के खिलाफ उनके ऐतिहासिक भाषण हुए. बीबीसी तक ने उन भाषणों को कवर किया था ऐसा जोशीजी बताते थे. तिवारीजी के भाषणों में पंडित शंभूनाथ शुक्ल नहीं, बल्कि पं जवाहरलाल नेहरू निशाने पर रहते थे. यहां तक कि लोहिया एक बार इस बात से नाराज भी हो गए थे कि अपना स्तर देख के विरोध भी करना चाहिए और उन्‍होंने कहा था 'नेहरू पर तो लोहिया ही अंगली उठा सकता है तिवारी को कहो कि वह अपने मुख्यमंत्री तक सीमित रहा करें'. पर तिवारी कहां किसी की सुना करते थे. उस 25 साल की उमर में तिवारीजी को 'मेयो की पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस' रटी थी. ऑफिस ऑफ प्रॉफिट वाली बहस में उनका भाषण लाजवाब था.

आगे चलकर नजीर भी बना. कुछ साल पहले जब सोनिया गांधी, जया बच्चन व अन्य नेताओं पर ये सवाल पार्लियामेंट में खड़ा हुआ तो विंध्यप्रदेश की ये बहस वहां नजीर के तौर पर पेश की गई. तिवारीजी सन् 72 में चंदौली सम्मेलन में जगदीशचंद्र जोशी के कहने पर कांग्रेस में शामिल हुए. तब वे मनगवां सीट से विधायक थे. इसके बाद वो कांग्रेस में सांस लेने लगे. उन्होंने बताया था कि जब वे कांग्रेसी बनकररीवा लौटे तो साथियों से कह दिया कि सोशलिस्ट पार्टी को वे गंगा में बहा आए हैं अब कांग्रेस में जीना और यहीं मरना है. तिवारीजी कितने प्रतिबद्ध कांग्रेसी बन गए थे इससे अनूठा उदाहरण राजनीति के इतिहास में कुछ हो ही नहीं सकता जो उन्होंने विधानसभा में अपने भाषण में दिया. सन् 74 में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चरम पर था. तिवारीजी ने मध्यप्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस की ओर से भाषण देते हुए यहां तक कह डाला- जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए आह्वान किया है. यह सरासर राष्ट्रद्रोह है. उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर जेल में डाल देना चाहिए... ये शब्द उन तिवारीजी के थे जो सोशलिस्ट में रहते हुए डॉक्‍टर लोहिया से ज्यादा जयप्रकाश को मानते थे. उन्हीं जयप्रकाश ने 1950 में रीवा में हिंद किसान पंचायत के सम्मेलन में जोशी-जमुना-श्रीनिवास का नारा दिया था.

तिवारीजी के लिए राजनीति के अपने नियम थे. वे जुनूनी थे राजनीति में रिश्ते और दिल निकालकर ताक पर रख देते थे. 1975 में इमरजेंसी लगी. उनके पुराने समाजवादी साथी जेल में बंद कर दिए गए. जोशीजी जोकि अब कांग्रेस में उनके नेता थे, जब कभी जेल में बंद पुराने समाजवादी साथियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते तो तिवारीजी कहते कि हमारी पार्टी (काग्रेस) और नेता (इंदिरा गांधी) के विरोधी हैं इन लोगों को जेल में ही सड़ना चाहिए. कवि ह्रदय जोशीजी ने अंततः कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया. तिवारीजी और अच्युतानंदजी को बुलाकर कहा, चलो अब जनता पार्टी में लौट चलते हैं.. तिवारी जी ने जवाब दिया- 'खसम किया बुरा किया, करके छोड़ दिया और बुरा किया. तब तो हम सोपा छोड़ना ही नहीं चाहते थे आपने छुड़वा दिया. अब जहां हूं, वहीं रहूंगा आपको जाना हो जाइए'. तबके इंदिरा गांधी के अत्यंत नजदीक, परमविश्वासी जोशीजी जनता पार्टी में चले गए. तिवारीजी ने एक सभा में संभवतः जोशीजी की शोकसभा में कहा था- जोशी जी तब कांग्रेस नहीं छोड़े होते तो वे 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते. कुछ समय तक इंदिराजी के यहां जोशीजी की वही हैसियत थी, जो आज सोनिया गांधी के यहां अहमद पटेल की है.

तिवारीजी राजनीति में बड़ी लकीर खींचने की बजाय उस लकीर को मिटाकर अपनी खींचने पर यकीन करते थे. अल्पकाल के लिए मंत्री और दस वर्ष तक विधानसभाध्यक्ष रहते हुए यही किया. 1980 की शुरुआत में उनकी अर्जुनसिंह से गाढ़ी छनती थी. वजह 1977 में नेता प्रतिपक्ष बनाने में तिवारीजी ने अर्जुन सिंह के लिए लॉबिंग की थी. तेजलाल टेंभरे इस पद के बड़े दावेदार थे. समाजवादी पृष्‍ठभूमि होने के नाते वे मानकर चल रहे थे कि तिवारीजी और उनका गुट सपोर्ट करेगा पर तिवारीजी ने कृष्णपाल सिंह व अन्य को अर्जुन सिंह के लिए तैयार किया. 1980 में मुख्यमंत्री बनने के बाद हाल यह था कि अर्जुन सिंह तिवारी जी के बंगले में राय-मशविरा करने जाते थे. तिवारीजी की कई टिप्स उनके काम भी आई. जैसे अर्जुन सिंह मुख्य सचिव को बर्खास्‍त करने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे थे. तिवारीजी ने अर्जुन सिंह से कहा कि 'ये पुण्य काम कल करना चाहते हैं तो आज-अभी करें. तभी प्रदेश चला पाएंगे'. फिर जो हुआ प्रदेश जानता है. समस्त नियमों को शिथिल करते हुए की भाषा तिवारीजी ने ही दी.

तिवारीजी की तार्किकता का कोई जवाब नहीं. एक बार उन्होंने शिक्षा विभाग की फाईल में टीप लिख दी. हंगामा मच गया. कैबिनेट में तिवारीजी ने कहा कि मैंने मंत्री पद की शपथ ली है विभाग की नहीं. हर फैसले की जब सामूहिक जिम्मेदारी होती है तो मेरे विभाग में भी शिक्षामंत्री का उतना ही अधिकार है, जितना मेरा उनके विभाग में. विभाग वितरण तो एक व्यवस्था है. कैबिनेट में मुख्यमंत्री की हैसियत को लेकर फर्स्‍ट एमंग इक्वल का सवाल उन्होंने तभी उठा दिया था जो आज सुप्रीम कोर्ट के जज लोग उठा रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्री पद से उनका इस्तीफा नितांत वैयक्तिक व पारिवारिक कारणों से हुआ था. अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री रहते उनकी दहशत का आलम यह था कि कांग्रेस में रहते हुए ही सहकारिता मंत्री राजेन्द्र जैन का ऐसा मसला उठा दिया कि लगा कि सरकार ही गिर जाएगी. उनके हरावल दस्ते में मोतीलाल वोरा, केपी सिंह, शिवकुमार श्रीवास्तव, हजारीलाल रघुवंशी जैसे दिग्गज हुआ करते थे. 1985 में इन सबकी टिकट कटी.

विधानसभाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने देश को बताया कि स्पीकर क्या होता है? उनका फॉर्मूला था मोटी चमड़ी-खुली जुबान. स्पीकर रहते हुए उन्होंने सबसे ज्यादा संरक्षण विपक्ष के विधायकों दिया. वे जिग्यासु विधायकों के सच्चे मायनों में गुरू थे. भाजपा की दूसरी लाईन के जो नेता आज मप्र, छग में राज कर रहे हैं प्रायः संसदीयग्यान के मामले में तिवारीजी के ही तराशे हुए हैं, चाहे वे नरोत्तम मिश्र हों या छग के ब्रजमोहन अग्रवाल. विधानसभा में उन्होंने कई प्रतिमान गढ़े, और संसदीय इतिहास को अविस्मरणीय बनाया. तिवारीजी को महज एक लेख में नहीं समेटा जा सकता वे जिंदगीभर एक खुली किताब रहे वक्त ने उसपर मोटी जिल्द चढ़ाकर सदा के लिए बंद कर दिया. उनकी स्मृतियों को नमन!

Aaryan Dwivedi

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