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'मेरी किडनी बेचकर सड़क और पुल बनवा दो', रीवा में युवक का अनोखा विरोध; भूख हड़ताल पर बैठा

मेरी किडनी बेचकर सड़क और पुल बनवा दो, रीवा में युवक का अनोखा विरोध; भूख हड़ताल पर बैठा
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रीवा में लोक निर्माण विभाग की लापरवाही के खिलाफ युवक ने अनोखा विरोध शुरू किया है। सड़क और पुल निर्माण के लिए उसने अपनी किडनी बेचने की पेशकश की और कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल पर बैठ गया। जानिए पूरा मामला।
  • रीवा में युवक का अनोखा विरोध, कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल
  • “मेरी किडनी बेचकर सड़क और पुल बनवा दो” – बैनर से प्रशासन को चुनौती
  • 2.51 करोड़ की योजना वर्षों से अधर में, आधा काम कर छोड़ा गया
  • लोक निर्माण विभाग पर लापरवाही के गंभीर आरोप

Unique Protest in Rewa – सिस्टम के खिलाफ अकेली आवाज

मध्य प्रदेश के रीवा जिले में प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ एक ऐसा विरोध सामने आया है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। धनेश सोनकर नामक युवक ने कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल शुरू कर दी है और अपने बैनर पर लिखा है – “मेरी किडनी बेचकर उस पैसे से सड़क और पुल बनवा दो।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो सालों से अपने गांव के विकास की राह देख रही है।

धनेश का कहना है कि उनके गांव तक पहुंचने वाली सड़क और पुल का निर्माण वर्षों पहले स्वीकृत हो चुका है, लेकिन आज तक पूरा नहीं हो पाया। उन्होंने कई बार लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिले। जब हर दरवाजा बंद होता नजर आया, तब उन्होंने यह कठोर कदम उठाने का फैसला किया।

कहां का मामला – Where Is the Problem?

यह मामला जवा तहसील के ग्राम पंचायत गाढ़ा से जुड़ा है। वर्ष 2022 में यहां 2.51 करोड़ रुपये की लागत से सड़क और पुल निर्माण को स्वीकृति दी गई थी। योजना के तहत गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए मजबूत पुल और पक्की सड़क बनाई जानी थी।

शुरुआत में काम भी शुरू हुआ, लेकिन कुछ समय बाद आधे में ही निर्माण रोक दिया गया। इसके बाद से लेकर आज तक न तो पुल बन पाया और न ही सड़क पूरी हो सकी। परिणाम यह हुआ कि गांव के सैकड़ों लोग आज भी कीचड़, कच्चे रास्तों और अस्थायी पगडंडियों के सहारे आवागमन करने को मजबूर हैं।

गांव की हकीकत – हर रोज़ की परेशानी

ग्रामीणों के अनुसार बारिश के मौसम में हालात और भी बदतर हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, बीमार मरीज और गर्भवती महिलाएं सभी को इस अधूरे रास्ते से गुजरना पड़ता है। कई बार एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती, जिससे लोगों की जान तक खतरे में पड़ जाती है।

धनेश सोनकर बताते हैं कि उन्होंने इन समस्याओं को लेकर कई बार अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। कभी जांच के आदेश दिए गए, कभी फाइल आगे बढ़ने की बात कही गई, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वैसी ही है। यही कारण है कि उन्होंने अब भूख हड़ताल का रास्ता चुना है।

Hunger Strike – क्यों उठाया इतना बड़ा कदम?

धनेश का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ उनके गांव की नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ है, जो योजनाओं को कागजों में कैद कर देता है। उन्होंने कहा, “जब सरकार के पास पैसे नहीं हैं तो मेरी किडनी बेच लो और उस पैसे से हमारे गांव की सड़क और पुल बनवा दो। कम से कम आने वाली पीढ़ी को तो परेशानी नहीं होगी।”

उनका यह बयान प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। कलेक्ट्रेट परिसर में बैठे इस युवक को देखने के लिए लोग रुक रहे हैं, उसके बैनर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं और स्थानीय प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

PWD पर आरोप – लापरवाही या सिस्टम की खामी?

लोक निर्माण विभाग (PWD) पर धनेश सोनकर ने सीधे तौर पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि काम शुरू होने के बाद बिना किसी ठोस वजह के निर्माण रोक दिया गया। न तो ठेकेदार बदला गया, न ही काम दोबारा शुरू हुआ। हर बार जब ग्रामीण अधिकारियों से पूछते हैं, तो उन्हें केवल “जांच चल रही है” या “फाइल ऊपर भेजी गई है” जैसे जवाब मिलते हैं।

धनेश के अनुसार, कई बार जांच के आदेश भी हुए, लेकिन उनका कोई नतीजा सामने नहीं आया। वर्षों बीत गए, लेकिन न पुल बना और न सड़क पूरी हुई। यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परियोजनाओं की कहानी है, जो स्वीकृति के बाद अधर में लटक जाती हैं।

ग्रामीणों की आवाज़ – अकेला नहीं है धनेश

धनेश के इस अनोखे विरोध को गांव वालों का पूरा समर्थन मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह आंदोलन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे गांव की पीड़ा का प्रतीक है। कई ग्रामीण कलेक्ट्रेट पहुंचकर उसके पास बैठे और प्रशासन से काम जल्द शुरू कराने की मांग की।

ग्रामीण बताते हैं कि अधूरी सड़क के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, किसानों को फसल बाजार तक ले जाने में परेशानी होती है और आपात स्थिति में गांव तक वाहन नहीं पहुंच पाते। यह केवल सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि जीवन और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

प्रशासन की प्रतिक्रिया – क्या मिला आश्वासन?

धनेश की भूख हड़ताल की सूचना मिलते ही प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने उसे समझाने की कोशिश की और आश्वासन दिया कि मामले की फिर से समीक्षा की जाएगी। हालांकि, अब तक कोई लिखित आदेश या ठोस समयसीमा सामने नहीं आई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहते हैं। उनका मानना है कि जब तक निर्माण कार्य दोबारा शुरू नहीं होता, तब तक यह आंदोलन खत्म नहीं होना चाहिए।

यह विरोध क्या संदेश देता है?

“मेरी किडनी बेचकर सड़क बनवा दो” जैसा नारा किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि उस हताशा का प्रतीक है, जहां एक आम नागरिक खुद को बेबस महसूस करता है। यह विरोध बताता है कि जब लोकतांत्रिक तरीकों से आवाज़ नहीं सुनी जाती, तब लोग अत्यधिक कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।

यह घटना प्रशासन और सरकार के लिए चेतावनी है कि योजनाओं को केवल स्वीकृत करना ही काफी नहीं, उन्हें जमीन पर उतारना भी उतना ही जरूरी है। वरना “विकास” का वादा केवल कागजों में सिमटकर रह जाएगा।

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❓ FAQs

यह मामला किस गांव से जुड़ा है?

यह मामला जवा तहसील के ग्राम पंचायत गाढ़ा से जुड़ा है, जहां सड़क और पुल का निर्माण वर्षों से अधूरा है।

कितनी राशि की योजना स्वीकृत हुई थी?

वर्ष 2022 में 2.51 करोड़ रुपये की लागत से सड़क और पुल निर्माण की स्वीकृति दी गई थी।

धनेश सोनकर ने विरोध का कौन सा तरीका चुना?

उन्होंने कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल शुरू की और बैनर पर “मेरी किडनी बेचकर सड़क और पुल बनवा दो” लिखा।

प्रशासन ने अब तक क्या किया?

अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर आश्वासन दिया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस आदेश या समयसीमा जारी नहीं हुई है।

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