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गैस के लगातार बढ़ रहे दाम, देशी चूल्हा का विकल्प समाप्त, गरीब व मध्यमवर्गीय के सामने मुश्किल
रीवा। पहले तो कहते थे कि महंगाई डायन खाये जात है लेकिन अब बताइये कौन खाये जात है। रोजमर्रा दैनिक वस्तुओं लेकर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम आसमान छू रहे हैं लेकिन अब चुप्पी साध ली गई। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम बेधड़क बढ़ते जा रहे हैं। पेट्रोल के दाम 100 के पार होने के बाद आमजनों को बड़ा झटका लगा है। माना जा रहा है कि लोगों के सैर-सपाटे पर अंकुश लगा होगा। तो दूसरी ओर रसोई गैस के दाम लगातार उछल रहे हैं।
रसोई गैस की कीमतों ने गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवारों को बड़ा झटका दिया है। महंगाई का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि फरवरी माह में रसोई गैस के तीसरी बार दाम बढ़ गये। ग्रामीणों के सामने और बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। पहले मुफ्त में सिलेण्डर दिया और लकड़ी-कंडे का विकल्प खत्म कर दिया गया। अब लगातार बढ़ रहे दाम से ग्रामीण जन मुश्किल में फंस गए हैं।
न लकड़ी बची न कंडे, केरोसीन का विकल्प समाप्त
मुफ्त में सिलेण्डर पाने के बाद ग्रामीण जन भी देशी चूल्हा का विकल्प खत्म कर दिया और धुआं रहित रसोई बना ली। लेकिन महंगाई ने उन्हें सोचने पर विवश कर दिया है। अब वह अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगे हैं। गरीब एवं मध्य वर्गीय ग्रामीण लोगों के सामने चूल्हा फूंकने का विकल्प भी समाप्त हो चुका है। गाय पालना बंद कर दिया, जलाऊ लकड़ी भी नहीं है। केरोसीन भी नहीं मिल रहा। अब समस्या यह हो रही है कि अनाज जो किसी तरह मिल भी गया तो पकाएंगे कैसे?




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