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BJP के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के कार्यकाल में 18 राज्यों में चुनाव होंगे, दो साल में 5 प्रदेश गंवाने वाली पार्टी को जीत की पटरी पर लाना बड़ी चुनौती

Aaryan Dwivedi
16 Feb 2021 11:42 AM IST
BJP के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के कार्यकाल में 18 राज्यों में चुनाव होंगे, दो साल में 5 प्रदेश गंवाने वाली पार्टी को जीत की पटरी पर लाना बड़ी चुनौती
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नई दिल्ली. भाजपा का अध्यक्ष पद संभालने वाले जेपी नड्डा (59) की खासियत नाराज व्यक्ति का भी दिल जीत लेना है। नड्डा पूर्व अध्यक्ष अमित शाह से 4 साल बड़े हैं और 2014 में भी वे अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल थे। शाह और मोदी के साथ-साथ संघ के करीबी माने जाने वाले नड्डा को अब अध्यक्ष बनने का मौका मिला। उनका कार्यकाल जनवरी 2023 तक रहेगा। इस दौरान पार्टी को 18 राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ने हैं। नए अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2 साल में 5 प्रदेशों में सत्ता गंवाने वाली भाजपा को जीत की पटरी पर वापस लाना है।

जिम्मेदारी मिलने की वजह? जेपी नड्डा स्वभाव से सहज हैं। सौम्यता इतनी कि नाराज व्यक्ति भी खुशी-खुशी ही वापस जाता है और प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। संगठन में माहिर माने जाते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में 13 साल तक काम किया इसलिए नेटवर्क बहुत बड़ा है। चुनाव प्रभारी रहते हुए 2019 में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में बसपा और सपा के गठबंधन को मात देकर भाजपा को जीत दिलाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में पहले से ज्यादा बहुमत से वापसी करवाने में भी नड्डा की अहम भूमिका मानी जाती है। संघ के करीबी और मोदी-शाह की पसंद।

किन कमियों से उबरना होगा? नड्डा स्वभाव से अंतर्मुखी हैं। बड़े और कड़े निर्णय तुरंत लेने की बजाय नड्डा सभी पक्षों से सलाह करने पर विश्वास करते हैं। जब तक पूरी तरह भरोसा न हो जाए, फैसला नहीं लेते। भाजपा अध्यक्ष के पद पर कई ऐसे मौके आएंगे, जब त्वरित और कठोर फैसले लेने पड़ेंगे। ऐसे वक्त में अपने मूल स्वभाव को वे कैसे बदलते हैं, यह देखना होगा।

नड्डा के सामने चुनौतियां क्या? 1) अमित शाह संगठन और व्यापकता के लिहाज से भाजपा को नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। शाह ने कार्यकर्ताओं को जोड़ने और उनके जनसंपर्क को व्यापक करने के लिए कई नए प्रयोग किए। संगठन को गतिशील बनाया। इसकी कमी अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान महसूस की गई थी। अब नड्डा के सामने चुनौती शह से बड़ी लकीर खींचने की है। 2) संघ और संघ परिवार के सभी संगठनों के साथ समन्वय को बरकरार रखना। 3) जनवरी 2023 तक के अपने कार्यकाल में 18 राज्यों में विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए जीत का रास्ता तैयार करना है। इसी दौरान राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं। 4) भाजपा ने 2018-19 में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र में सत्ता गंवाई है। ऐसे में कार्यकर्ताओं को संगठित कर पार्टी को जीत की पटरी पर वापस लाना होगा।

नड्डा ही क्यों: सामाजिक समरसता और सोशल इंजीनियरिंग का तालमेल नड्‌डा का चयन संगठन क्षमता और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए बारीक विश्लेषण के आधार पर किया गया। संघ सामाजिक समरसता की बात करता है, भाजपा चुनावी लिहाज से सोशल इंजीनयरिंग की। नड्डा दोनों में फिट हैं। संघ और मोदी-शाह की नजर लोकसभा चुनाव के समय ही नड्डा पर थी। उत्तर प्रदेश की चुनौती को नड्डा ने बखूबी निभाया। शाह की टीम में सिर्फ नड्‌डा ही ऐसे महासचिव थे, जो संगठन के पदों पर क्रमानुगत तरीके से बढ़े हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पिछले पांच साल में मोदी-शाह की जोड़ी ने पिछड़ों-दलितों को साधने की रणनीति पर काम किया। इसका खामियाजा पार्टी को 2018 में भुगतना भी पड़ा, जब दलित आंदोलन हिंसक हो गया था। सवर्ण भी नाराज हो गए थे। संघ की सलाह पर सवर्णों को 10% आरक्षण देने का फैसला भी किया था। भाजपा हमेशा से सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही थी। अभी भाजपा के तीन सीएम योगी आदित्यनाथ, त्रिवेंद्र सिंह रावत और जयराम ठाकुर सवर्ण हैं। लेकिन, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत सिंह के निधन के बाद से पार्टी में ब्राह्मणों के लिहाज से खालीपन आया। और, ऐसे में संगठन कुशलता की वजह से नड्‌डा ज्यादा मुफीद हैं।

मूलत: हिमाचल के पर करियर की शुरुआत बिहार में हुई

  • नड्डा मूलत: हिमाचल के हैं, लेकिन उनका जन्म बिहार की राजधानी पटना में हुआ। पिता पटना यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर थे और यहीं पर नड्डा पहली पार छात्र संगठन के सचिव बने। जेपी आंदोलन के समय राजनीति में आए और बाद में एबीवीपी से जुड़े।
  • एलएलबी की डिग्री हिमाचल यूनिवर्सिटी से ली और यहां 1983-84 में अध्यक्ष बने। फिर, एबीवीपी के संगठन मत्री बने और 1991-1993 में भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने।
  • 1993 में पहली बार हिमाचल से विधायक चुने गए। 1994-98 तक विधानसभा में पार्टी के नेता रहे। 1998 में दोबारा विधायक चुने गए और उन्हें प्रदेश में स्वाथ्य और संसदीय मामलों का मंत्री बनाया गया। 2007 में फिर चुनाव जीते और प्रेम कुमार धूमल सरकार में मंत्री बने। 2010 में धूमल सरकार से मंत्री पद से इस्तीफा देकर उन्हें नितिन गडकरी की टीम में राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया।
  • नितिन गडकरी, राजनाथ और अमित शाह की टीम में उन्हें महासचिव के रूप में रखा गया। 2012 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और शाह ने अपनी टीम में संसदीय बोर्ड का सचिव भी बनाया।
  • मोदी सरकार के पहले फेरबदल में वे स्वास्थ्य मंत्री बने। 19 जून 2019 को लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया।
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