मध्यप्रदेश

एमपी: सड़कों पर सब्जी बेचने वाली मां की बिटिया बनी जज, रिजल्ट देख छलक पड़े सभी के आँसू

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एमपी के इंदौर की सड़कों पर सब्जी बेचने वाली मां की बिटिया बनी जज

मां सड़क पर सब्जी की बिक्री कर रही थी, इसी बीच उसकी 25 वर्षीय बेटी अंकिता नागर हाथ में रिजल्ट लेकर पहुची और सबसे पहले आपनी मां को खुशखबरी दी कि वह सिविल जज की परीक्षा में पास हो गई है और वह जज बन गई हैं। यह सुनते ही उसकी मां के आँखों से आंसू छलक पड़े। सब्जी बेचने वाले माता-पिता को अपनी होनहार बिटिया पर नाज़ है। अंकिता का कहना था कि रिजल्ट एक हफ्ते पहले ही जारी हो गए थें, लेकिन परिवार में मौत हो जाने के कारण सभी गम में थें, जिसके चलते उसने किसी को अपने रिजल्ट के बारे में नहीं बताया था।

माता-पिता करते है सब्जी का व्यापार

एससी कोटे से सिविल जज में 5वां स्थान हासिल करने वाली अंकिता का कहना है कि उसके परिवार के पूरे सदस्य सब्जी बेचने का काम करते हैं। अंकिता ने मीडिया को बताया कि पापा सुबह 5 बजे उठकर मंडी चले जाते हैं। मम्मी सुबह 8 बजे सभी के लिए खाना बनाकर पापा के सब्जी के ठेले पर चली जाती हैं, फिर दोनों सब्जी बेचते हैं। बड़ा भाई आकाश रेत मंडी में मजदूरी करता है। छोटी बहन की शादी हो चुकी है।

पढ़ाई के साथ सब्जी बेचने में करती थी मदद

अंकिता होनहार होने के साथ ही माता-पिता के लिए अच्छी बेटी भी है, वह पढ़ाई के साथ शाम के समय सब्जी बेचने के काम में मां और पिता का हाथ बटाती थी। उसका कहना है कि वह छोटे से कमरें में रोजाना 8 घंटे पढ़ाई को देती थीं। दिन में पढ़ने के साथ ही वह रात में 10 बजे दुकान बंद होने के बाद 11 बजे से फिर पढ़ाई करती थी।

3 वर्षो से कर रही थी तैयारी

अंकिता पिछले तीन वर्षो से सिविल जज की तैयारी कर रही थी। 2017 में इंदौर के वैष्णव कॉलेज से एलएलबी किया। इसके बाद 2021 में एलएलएम की परीक्षा पास की। कॉलेज के बाद लगातार सिविल जज की तैयारी में जुटी रही। दो बार सिलेक्शन नहीं होने के बाद भी माता-पिता हौसला देते रहें।

रिजल्ट से नही होना चाहिए निराश

अंकिता का कहना है कि रिजल्ट से कभी निराश नही होना चाहिए बल्कि और ज्यादा प्रयास करने चाहिए। रिजल्ट में नंबर कम-ज्यादा आते रहते हैं, लेकिन छात्र-छात्राओं को हौसला रखना चाहिए। असफलता मिलने पर नए सिरे से कोशिशें करना चाहिए। भविष्य में जरूर अच्छा रिजल्ट आएगा।

मुश्किलों से की पढ़ाई

अंकिता ने बताया कि पिता उधार लेकर कॉलेज की फीस भरते थे। उनके घर में कमरे बहुत छोटे हैं। गर्मी में छत पर लगे पतरे इतने गर्म हो जाते हैं कि पसीने से किताबें गीली हो जाती थीं। बारिश में पानी टपकता है। गर्मी देख भाई ने अपनी मजदूरी से रुपए बचाकर कुछ दिन पहले ही एक कूलर दिलवाया है। मेरे परिवार ने मेरी पढ़ाई के लिए इतना कुछ किया है, जिसे बताने के लिए उसके पास शब्द नहीं है।

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