मऊगंज

सच में 'MP गजब है': मऊगंज में 1000 केस, सिर्फ 6 गवाह—500 मामलों का चश्मदीद एक ही आदमी

सच में MP गजब है: मऊगंज में 1000 केस, सिर्फ 6 गवाह—500 मामलों का चश्मदीद एक ही आदमी
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मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में CCTNS पोर्टल की जांच में सामने आया है कि 1000 से ज्यादा मामलों में केवल 6 लोगों को गवाह बनाया गया, जिनमें एक व्यक्ति 500 से अधिक केसों का ‘रिकॉर्डधारी’ गवाह निकला। मामला सामने आने के बाद थाना प्रभारी पर कार्रवाई हुई है।
  • मऊगंज के नईगढ़ी और लौर थाना में 1000+ मामलों में सिर्फ 6 लोग बने सरकारी गवाह
  • एक ही व्यक्ति 500 से ज्यादा केस में दर्ज – कानून की आत्मा पर सवाल
  • CCTNS पोर्टल की जांच से खुला पूरा खेल
  • नईगढ़ी थाना प्रभारी पर गिरी कार्रवाई की गाज

Rewa Mauganj News – कानून की भाषा में गवाह वह व्यक्ति होता है जिसने किसी घटना को अपनी आंखों से देखा हो, या जो किसी विषय का विशेषज्ञ हो और अदालत को निष्पक्ष सच्चाई बता सके। उसकी गवाही पर ही न्याय की नींव टिकी होती है। लेकिन रीवा संभाग अंतर्गत मऊगंज जिले से सामने आई यह कहानी इस परिभाषा को ही चुनौती देती है। यहां पुलिस ने गवाह की एक नई श्रेणी बना दी – “थाने का पहचान का आदमी।”

मध्यप्रदेश के नवगठित मऊगंज जिले में स्थित लौर और नईगढ़ी थाना क्षेत्रों में ऐसा खेल सामने आया है, जिसने पूरे न्यायिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। CCTNS पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों की जांच में खुलासा हुआ कि 1000 से ज्यादा आपराधिक मामलों में महज 6 लोगों को ही सरकारी गवाह बना दिया गया। इनमें से कुछ नाम ऐसे हैं, जो सैकड़ों बार दोहराए गए हैं। एक तो ऐसा है जो 500 मामलों में चश्मदीद है।

CCTNS Portal Exposes Truth | CCTNS पोर्टल ने खोली पोल

यह मामला तब उजागर हुआ जब स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पुलिस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए शिकायतें कीं। इसके बाद CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network & System) पोर्टल से रिकॉर्ड निकाले गए। डेटा सामने आते ही हर कोई हैरान रह गया।

रिकॉर्ड बताते हैं कि दिनेश कुशवाहा, राहुल विश्वकर्मा, अरुण तिवारी और अमित कुशवाहा जैसे नाम सैकड़ों मामलों में बार-बार गवाह के तौर पर दर्ज किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इन लोगों को आबकारी, NDPS, जुआ, अवैध शराब, मारपीट और अन्य गंभीर अपराधों में एक ही दिन में कई मामलों का चश्मदीद बताया गया।

सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर हुई कई घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी हो सकता है? क्या यह व्यावहारिक है कि कोई आम नागरिक हर छापे, हर गिरफ्तारी और हर जब्ती में मौजूद रहे? जवाब साफ है – नहीं।

Concept of Witness Under Question | गवाही की अवधारणा पर सवाल

भारतीय कानून में गवाह का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना अनिवार्य माना गया है। गवाह न तो पुलिस का अधीनस्थ हो सकता है और न ही किसी पक्ष से जुड़ा हुआ। लेकिन मऊगंज में जो सामने आया, वह इसके ठीक उलट है।

जांच में पता चला कि जिन लोगों को सरकारी गवाह बनाया गया, वे अधिकतर थानों से जुड़े हुए थे। कोई थाना प्रभारी का ड्राइवर था, कोई रसोइया, तो कोई कार्यालय का सहायक। यानी वे लोग, जो पुलिस के रोजमर्रा के कामकाज में साथ रहते थे, उन्हीं को बिना घटनास्थल की वास्तविक मौजूदगी के गवाह बना दिया गया।

इससे सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि अदालतों में पेश होने वाले मामलों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया। अगर गवाह ही निष्पक्ष नहीं है, तो फैसले कैसे निष्पक्ष होंगे? यही कारण है कि अब इस पूरे सिस्टम पर गंभीर बहस शुरू हो गई है।

Record Holder Witness | 500 केस का ‘रिकॉर्डधारी’ गवाह

सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है अमित कुशवाहा। CCTNS रिकॉर्ड के मुताबिक, अमित को 500 से अधिक मामलों में गवाह बनाया गया है। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है, जो पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है।

जब इस पर सवाल उठे तो पुलिस ने RTI के जवाब में दावा किया कि अमित कुशवाहा उनका वाहन चालक नहीं है और वह स्वतंत्र नागरिक है। लेकिन मीडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने इस दावे की पोल खोल दी। कैमरे में अमित कुशवाहा को नईगढ़ी थाने की सरकारी गाड़ी चलाते हुए रिकॉर्ड किया गया।

यह दृश्य सामने आते ही पुलिस के आधिकारिक बयान पर भरोसा करना मुश्किल हो गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि गवाहों को लेकर पुलिस द्वारा दी गई जानकारी अधूरी और भ्रामक थी।

Naigarhi Police Station at Center | नईगढ़ी थाना बना पूरे खेल का केंद्र

Rewa Mauganj Witness Scam की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, एक बात साफ होती चली गई—इस पूरे सिस्टम का केंद्र नईगढ़ी थाना रहा। अधिकांश संदिग्ध गवाहों की एंट्री यहीं से शुरू हुई। NDPS, आबकारी, जुआ, अवैध शराब, मारपीट जैसे मामलों में एक ही नाम बार-बार सामने आया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से नईगढ़ी क्षेत्र में पुलिस की कार्रवाई एक तय पैटर्न पर होती रही। छापे पड़ते, आरोपियों को पकड़ा जाता और हर बार वही “परिचित चेहरे” गवाह के तौर पर फाइल में दर्ज हो जाते। न कोई नया गवाह, न कोई स्वतंत्र नागरिक। इससे पुलिस को कागजी कार्रवाई में आसानी मिलती और केस तुरंत तैयार हो जाता।

यही वजह है कि इस पूरे मामले को अब सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित व्यवस्था के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षों से यह सिस्टम चुपचाप चलता रहा और किसी ने गंभीरता से सवाल नहीं उठाए।

Role of TI Jagdish Thakur | थाना प्रभारी की भूमिका

इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर का नाम प्रमुखता से सामने आया है। आरोप है कि उनके कार्यकाल में ही यह “गवाह व्यवस्था” सबसे अधिक सक्रिय रही। अधिकांश विवादित मामलों में उन्हीं के समय के रिकॉर्ड पाए गए।

जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ, पुलिस प्रशासन हरकत में आया। शुरुआती जांच के बाद जगदीश ठाकुर को नईगढ़ी थाने से हटाकर पुलिस लाइन भेज दिया गया। यह कदम साफ संकेत देता है कि प्रशासन इस मामले को हल्के में नहीं ले रहा।

हालांकि सवाल यह है कि क्या केवल ट्रांसफर ही पर्याप्त है? जब सैकड़ों मामलों की वैधता पर सवाल खड़े हो चुके हों, तब क्या सिर्फ एक अधिकारी को हटाने से व्यवस्था सुधर जाएगी?

Impact on Justice System | न्याय व्यवस्था पर असर

इस मामले को Witness Scam in MP की तरह देखते हैं। यह एक सिंडीकेट की तरह काम करता दिख रहा है और यह सिर्फ दो थानों तक सीमित हो यह हो नहीं सकता। अगर जांच की जाय तो मऊगंज ही नहीं, रीवा जिले के भी कई थाने और थानेदार इसके चपेट में आ जाएंगे। संभव है की यही स्थिति पूरे प्रदेश में भी हो।

इसका एक सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इससे अदालतों में चल रहे सैकड़ों मामलों की नींव हिल गई है। जिन मामलों में एक ही व्यक्ति को बार-बार गवाह बनाया गया, वे अब कानूनी रूप से कमजोर हो सकते हैं।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह साबित हो गया कि गवाह स्वतंत्र नहीं थे और पुलिस के प्रभाव में थे, तो कई मामलों में सजा पाए आरोपियों को राहत मिल सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि वास्तविक अपराधी कानून के शिकंजे से बाहर निकल सकते हैं।

साथ ही, निर्दोष लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों की निष्पक्षता भी संदिग्ध हो जाती है। आम नागरिक का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठना सबसे बड़ा खतरा है।

Why It Happened | ऐसा क्यों हुआ?

सवाल उठता है कि आखिर पुलिस ने यह रास्ता क्यों चुना? इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण बताए जा रहे हैं—

पहला, स्वतंत्र गवाह ढूंढना कठिन और समयसाध्य प्रक्रिया है। दूसरा, आम लोग पुलिस और अदालत के चक्कर से बचना चाहते हैं। तीसरा, विभागीय दबाव में जल्दी-जल्दी केस तैयार करना होता है।

इन परिस्थितियों में कुछ थानों ने आसान रास्ता चुना—अपने ही भरोसेमंद लोगों को हर केस में गवाह बना देना। लेकिन यह “सुविधा” धीरे-धीरे एक सिस्टमेटिक गड़बड़ी में बदल गई।

What Needs to Change | अब क्या बदले?

इस पूरे प्रकरण ने साफ कर दिया है कि केवल तकनीक होना पर्याप्त नहीं है। CCTNS पोर्टल ने डेटा तो दिया, लेकिन जब तक उस पर नियमित ऑडिट और निगरानी नहीं होगी, तब तक ऐसे खेल चलते रहेंगे।

विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि हर थाने में गवाहों की सूची का त्रैमासिक ऑडिट होना चाहिए। एक ही नाम यदि बार-बार दिखे, तो सिस्टम अपने आप अलर्ट दे। साथ ही, गवाह बनने वालों का बैकग्राउंड और पुलिस से संबंध भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए।

इसके अलावा, आम नागरिकों को भी यह भरोसा दिलाना होगा कि गवाही देना जोखिम नहीं, बल्कि समाज के लिए सम्मान की बात है। जब लोग आगे आएंगे, तभी पुलिस को “थाने के लोगों” पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

FAQs | अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मऊगंज में गवाह घोटाला क्या है?

यह वह मामला है जिसमें 1000 से अधिक आपराधिक मामलों में केवल 6 लोगों को गवाह बनाया गया, और एक ही व्यक्ति को 500 से ज्यादा केसों में दर्ज किया गया।

यह खुलासा कैसे हुआ?

स्थानीय शिकायतों के बाद CCTNS पोर्टल के डेटा की जांच की गई, जिसमें गवाहों के नाम बार-बार दोहराए जाने का पैटर्न सामने आया।

इसका असर किन मामलों पर पड़ेगा?

NDPS, आबकारी और अन्य गंभीर अपराधों के वे सभी केस प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें ये विवादित गवाह शामिल हैं।

प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?

नईगढ़ी थाना प्रभारी जगदीश ठाकुर को हटाकर पुलिस लाइन भेजा गया है और पूरे मामले की जांच जारी है।

भविष्य में ऐसी गड़बड़ी कैसे रोकी जा सकती है?

नियमित ऑडिट, तकनीकी अलर्ट सिस्टम और स्वतंत्र नागरिकों को गवाह बनने के लिए प्रोत्साहित कर इस तरह की गड़बड़ियों पर रोक लगाई जा सकती है।

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