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आखिर क्यों पीपल की पूजा करने से दूर हो जाती है शनि ढैय्या व साढ़ेसाती, जानिए पौराणिक कथा

Manoj Shukla
27 Jun 2021 3:21 PM IST
आखिर क्यों पीपल की पूजा करने से दूर हो जाती है शनि ढैय्या व साढ़ेसाती, जानिए पौराणिक कथा
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पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने, दीपक जलाने एवं तेल चढ़ाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी प्रकार के कष्टों को दूर करते हैं।

शनिवार के दिन ज्यादातर लोगों को आपने पीपल के पेड़ की पूजा-अर्चना एवं दीपक आदि चढ़ाते देखा होगा। इसके पीछे मान्यता है कि पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने, दीपक जलाने एवं तेल चढ़ाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी प्रकार के कष्टों को दूर करते हैं। इसके अलावा किसी भी व्यक्ति पर शनिदेव की महादशा चल रही हो ऐसे में विद्वान पीपल की पूजा करने का उपाय जरूर बताते हैं। ऐसे में कभी-कभार आपके मन में यह प्रश्न जरूर आता होगा कि ब्रम्‍हांड के सबसे शक्तिशाली और क्रूर ग्रह शनि का क्रोध मात्र पीपल वृक्ष की पूजा करने से आखिर क्यों शांत हो जाता हैं। ऐसे आज हम आपके इस प्रश्न का उत्तर देने जा रहे हैं।

हालांकि पीपल के वृक्ष एवं शनि देव से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलन में हैं। ऐसे में एक पौराणिक कथा का हम यहां जिक्र करने जा रहे हैं। जिसे शायद आपने कहीं से सुना भी हो। पौराणिक मान्यताओं की माने तो एक बाार त्रेता युग में अकाल पड़ गया था। उसी काल में कौशिक मुनि नाम के एक ऋषि अपने बच्चों के साथ रहते थे। बच्चांे का पेट न भरने के कारण मुनि अपने बच्चों को लेकर दूसरे राज्य में रोजी-रोटी के लिए निकल पड़े।

आखिर क्यों पीपल की पूजा करने से दूर हो जाती है शनि ढैय्या व साढ़ेसाती, जानिए पौराणिक कथा

यात्रा के दौरान उनके बच्चे भूख से बिलख रहे थे। लिहाजा मुनि ने एक बच्चे को रास्ते में ही छोड़ दिया। मुनि ने जहां अपने बच्चे को छोड़ा वहां पीपल का पेड़ था। उसी पेड़ के नीचे वह बालक सो गया था और वहीं रहने लगा। वह पीपल के फल का सेवन करके धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। इसी पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर वह तपस्या भी करता था। एक दिन देवादि देव नारद ऋषि वहां से गुजर रहे थे। नारद जी ने उस बच्चे को देखा और उसे शिक्षा देनी शुरू कर दी। साथ ही भगवान विष्णु की स्तुति करने का पूरा विधान बताया। नारद जी द्वारा बताए विधान के अनुसार वह बालक भगवान विष्णु की कठिन तपस्या करने लगा।

बालक की कठिन तपस्या से भगवान प्रसन्न हुए और एक दिन दर्शन दिए। इस दौरान भगवान विष्णु ने बालक से कहा कि मैं आपकी तपस्या से अति प्रसन्न हूं। आप कोई भी वरदान मांग लो। बालक ने प्रभु से भक्ति एवं योग का वर मांगा। तदुपरांत वह वहीं रहकर श्रीहरि विष्णु की तपस्या करने लगा और एक बड़ा तपस्वी हो गया। एक दिन बालक ने नारद से पूछा कि प्रभु आप बताइए कि मेरा परिवार कहां हैं और वह किस हाल में हैं। मुझे यहां अकेला क्यों छोड़ दिया।

बालक के सवाल का जवाब देते हुए नारद जी ने कहा कि आपके इस हाल के पीछे शनिदेव का प्रकोप था। देखो आकाश में यह शनैश्चर दिखाई दे रहा है। बालक क्रोध से भर गया। उसने अपने उग्र दृष्टि से उस शनैश्चर को नीचे गिरा दिया। जिससे शनैश्चर का पैर टूट गया। और शनि असहाय हो गए।

शनि का हाल देख नारद प्रसन्न हुए तो अन्य देवता आश्चर्य में पड़ गए। शनि का हाल देख ब्रम्हा जी भी वहां प्रगट हुए। ब्रम्हा जी ने बालक से कहा कि आपको शनि देव के चलते जीवन में बहुत कष्ट मिला हैं। इस दौरान आपने कठिन तपस्या की है। आपने पीपल का फल सेवन करके जीवन जिया है। इसलिए आज से आप पिपलाद ऋषि के नाम से जाने जावोगे। आज से आपको जो याद करेगा उसके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाएंगे।

आज से जो भी व्यक्ति पीपल की पूजा करेगा शनि उसे कभी कष्ट नहीं देंगे। लिहाजा अब आप शनि देव को आकाश में स्थापित कर दो। ब्रम्हाजी की बात मानते हुए पिपलाद ने शनि से वचन लिया कि आज से जो भी व्यक्ति पीपल की पूजा करेगा आप उसे कभी कष्ट नहीं दोगे। उस दिन से यह परंपरा है जो ऋषि पिपलाद को याद करके शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उसको शनि की साढ़े साती, शनि की ढैया और शनि की महादशा कष्टकारी नहीं होती है।

मान्यता है कि शनि की पूजा और व्रत एक वर्ष तक लगातार करनी चाहिए। शनि को तिल और सरसो का तेल बहुत पसंद है इसलिए तेल का दान भी शनिवार को करना चाहिए।

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