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दादा और दाऊ के बाद नेतृत्व विहीन हुआ विंध्य, पढ़िए पूरी खबर..

Aaryan Dwivedi
16 Feb 2021 6:37 AM GMT
दादा और दाऊ के बाद नेतृत्व विहीन हुआ विंध्य, पढ़िए पूरी खबर..
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दादा और दाऊ के बाद नेतृत्व विहीन हुआ विंध्य, पढ़िए पूरी खबर..रीवा। एक जमाना था जब विंध्य का प्रदेश नहीं देश में जलजला था। विंध्य के नेताओं

दादा और दाऊ के बाद नेतृत्व विहीन हुआ विंध्य, पढ़िए पूरी खबर..

रीवा। एक जमाना था जब विंध्य का प्रदेश नहीं देश में जलजला था। विंध्य के नेताओं की पूछपरख दिल्ली तक होती थी। उनके सलाह मशविरे देश की राजनीतिक दशा-दिशा में लिये जाते थे। सीनियर नेता खुद विंध्य के नेताओं से मेल-मुलाकात करने आते थे। सरकार बनाते थे और गिरा भी देते थे।

ऐसे नेताओं में शुमार स्व. यमुना प्रसाद शास्त्री, स्व. कुंवर अर्जुन सिंह, स्व. श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी, स्व. शत्रुधन सिंह तिवारी, स्व. गोविंद नारायण सिंह, स्व. चंद्रप्रताप तिवारी सहित अन्य शामिल हैं। किंतु वर्तमान समय में विंध्य पूरी तरह नेतृत्व के मामले में शून्य है। नेतृत्व का मतलब इससे नहीं है कि हम विधायक बन गये अथवा सांसद का चुनाव जीत लिया है। जबकि नेतृत्व आंतरिक कार्यक्षमता, संघर्षशीलता,सेवा भावना, जनभावना, आमजन से प्रेम, लगाव पर निहित है। जो आज किसी में नहीं दिखती नहीं है। यही कारण है कि चुनाव जीतने के बाद भी विंध्य के जनप्रतिनिधि शून्य हैं।

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विंध्य का हित सर्वोपरि रहा

जिन नेताओं ने विंध्य का नेतृत्व किया है उनके लिये विंध्य का हित, जनमानस का हित सर्वोपरि रहा है। उनकी यही भावना उन्हें विंध्य अगुआ और नेतृत्व प्रदान करती थी। लेकिन आज यह सब नहीं दिख रहा है। आज सिर्फ चुनाव जीतना सर्वोपरि रहा है। विंध्य हित हो चाहे अनहित, जनमानस किस हाल में इससे लेना देना नहीं है। चुनाव जीत जायेंगे, विकास करा लेंगे। सड़क, पानी की सुविधा मिलेगी तो जनता वोट भी कर देगी, जो आज के समय चल रहा है लेकिन जनता के हर दुख-दर्द में सहभागी होना अलग बात है। पहले हमारे नेता विंध्य के हित सर्वोपरि रखा है, उनमें पद का मोह जरा भी नहीं रहा। विधायकी का त्याग कर दिया। मंत्री पद त्याग दिया। क्षेत्र छोड़ दिया। राज्य छोड़, घर छोड़ दिया लेकिन विंध्य के हित लड़ाई कभी नहीं छोड़ी।

विंध्य के साथ साजिश

पहले ऐसा लगा कि विंध्य की कमान अजय सिंह राहुल सीधी एवं राजेन्द्र शुक्ल रीवा संभालेंगे लेकिन ऐसा कुछ दिख नहीं रहा। जिस तरह से विंध्य को साजिश के तहत अलग-थलग रखा जा रहा उससे विंध्य के साथ साजिश ही झलक रही है। विगत चुनाव में अजय सिंह राहुल विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव में हार का सामना कर चुके हैं।

वहीं राजेंद्र शुक्ल रीवा जिले से चैथी बार विधायक हैं। लेकिन विंध्य में दोनों कोई संघर्ष नजर नहीं आ रहा है। गुपचुप राजनीति साधने में जुटे रहते हैं और गुपचुप राजनीति तो सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए होती है। जनमानस के लिए संघर्ष आइने की तरह होता है। अजय सिंह भी ज्यादातर समय भोपाल में व्यतीत करने लगे हैं तो राजेंद्र शुक्ल भी कार्यक्रमों तक सीमित रहते हैं।

आभार से विंध्य की जनता का कल्याण नहीं होगा

प्रदेश भर में सबसे ज्यादा 24 विधायक भाजपा को विंध्य ने दिया है। जिसकी वजह से भाजपा की सरकार बन सकी है। इस बात को स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान विगत दिनों रीवा जिले के दौरे में आमजनता के समक्ष स्वीकार कर चुके हैं और कहा कि आज हम मुख्यमंत्री विंध्य की जनता की वजह से बने हैं। इतने के बाद भी विंध्य की उपेक्षा पीड़ा पहुंचाने वाली है। लेकिन आभार से विंध्य का कल्याण होने वाला नहीं है।

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एक समय था जब विंध्य का एक विधायक सरकार की नाक में दम कर देता था और विंध्य के हित की बात सरकार को माननी पड़ती थी लेकिन वर्तमान में 25 से 30 विधायक विंध्य से हैं फिर भी अपने-अपने बिलों में छिपे हुए हैं। किसी की हिम्मत नहीं कि वह कुछ बोल सके। कुछ कह सके। अंधे के कंधे पर लगड़ा जैसी कहानी कहती नजर आ रही है, जो अपने को बचाने की तरकीब निकाल लिये। यहां के नेता भी अपने बचाने की चिंता में डूबे रहते हैं। ऐसे में विंध्य का तो भगवान ही मालिक है।

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