Supreme Court Euthanasia Verdict: 13 साल से कोमा में युवक को इच्छामृत्यु की मंजूरी, लाइफ सपोर्ट से हटाने की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े 31 वर्षीय हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी दी। AIIMS को चरणबद्ध तरीके से लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्देश।

Update: 2026-03-11 10:52 GMT

नई दिल्ली. भारत के न्यायिक इतिहास में बुधवार को एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े 31 वर्षीय युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु यानी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। यह मामला देश में इस तरह का पहला बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले कई वर्षों से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया है कि मरीज की गरिमा बनाए रखते हुए उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए।

Supreme Court Passive Euthanasia Verdict: अदालत ने दी ऐतिहासिक मंजूरी

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने सुनाया। अदालत ने कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती और वह लंबे समय से लाइफ सपोर्ट पर है, तो कुछ परिस्थितियों में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी जा सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील तरीके से की जानी चाहिए, ताकि मरीज की गरिमा और सम्मान बना रहे। इसी वजह से एम्स को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध और मेडिकल मानकों के अनुसार हो।

Harish Rana Euthanasia Case: माता-पिता की अपील पर आया फैसला

यह मामला हरीश राणा के माता-पिता निर्मला राणा और अशोक राणा की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। परिवार ने अदालत से अपील की थी कि उनके बेटे की हालत बेहद गंभीर है और उसकी रिकवरी की कोई संभावना नहीं है।

फैसले के बाद हरीश के पिता अशोक राणा ने कहा कि वे पिछले तीन साल से इस लड़ाई को लड़ रहे थे। उन्होंने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा फैसला नहीं लेना चाहते, लेकिन बेटे की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने यह कदम उठाया।

उन्होंने बताया कि हरीश को अब एम्स ले जाया जाएगा, जहां डॉक्टर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आगे की प्रक्रिया करेंगे।

Punjab University Student Accident: हॉस्टल से गिरने के बाद बदली जिंदगी

हरीश राणा का जन्म दिल्ली में हुआ था और वे चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। पढ़ाई में वे बेहद होनहार थे और यूनिवर्सिटी में टॉपर माने जाते थे।

साल 2013 में एक हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। वे हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए, जिसके बाद उन्हें गंभीर चोटें आईं। इस हादसे के बाद उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वे कोमा में चले गए।

तब से वे लगातार बिस्तर पर हैं और न तो बोल सकते हैं और न ही किसी चीज को महसूस कर पाते हैं।

Quadruple Paralysis Condition: डॉक्टरों ने बताई गंभीर बीमारी

डॉक्टरों ने हरीश की स्थिति को क्वाड्रिप्लेजिया बताया है। इस बीमारी में मरीज के शरीर के चारों अंग पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। मरीज को जीवित रखने के लिए वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब की जरूरत पड़ती है।

डॉक्टरों के अनुसार इस स्थिति में मरीज के ठीक होने की संभावना बेहद कम होती है। लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण हरीश के शरीर पर कई जगह गहरे घाव यानी बेडसोर्स भी बन गए हैं और उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।

Financial and Emotional Burden: परिवार पर पड़ा भारी असर

हरीश की देखभाल पिछले 13 साल से लगातार चल रही है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और अन्य मेडिकल खर्चों ने परिवार को आर्थिक रूप से काफी कमजोर कर दिया है।

परिवार के लिए अपने बेटे को इस हालत में देखना मानसिक रूप से भी बेहद कठिन रहा है। माता-पिता का कहना है कि बेटे की पीड़ा को देखकर वे खुद भी टूट चुके हैं।

Right to Die Debate India: फैसले में शेक्सपीयर का जिक्र

फैसला सुनाते समय जस्टिस पारदीवाला ने कई विचारकों के शब्दों का जिक्र किया। उन्होंने अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन मनुष्य की इच्छा से नहीं बल्कि परिस्थितियों से जुड़ा होता है।

उन्होंने प्रसिद्ध लेखक विलियम शेक्सपीयर के नाटक ‘हैमलेट’ की मशहूर पंक्ति “To be or not to be” का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि कई बार अदालतों को इसी तरह के सवालों के आधार पर “मरने के अधिकार” जैसे कठिन मुद्दों पर फैसला करना पड़ता है।

Passive Euthanasia Law India: केंद्र से कानून बनाने की अपील

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र सरकार से यह भी कहा कि पैसिव यूथेनेशिया को लेकर स्पष्ट कानून बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।

फिलहाल भारत में इच्छामृत्यु केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आधार पर ही संभव है। इसके लिए मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए दो मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी होती है।

 

यह ऐतिहासिक फैसला भारत में “राइट टू डाई” यानी गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार पर नई बहस को जन्म दे सकता है। साथ ही यह मामला भविष्य में बनने वाले कानूनों और मेडिकल नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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