चीन अपने आक्रामक तेवर की आड़ में ठप्पा लगाकर बना रहा सूची, कर रहा भविष्य की तैयारी
NEW DELHI: चीन पिछले कुछ महीनों से जो आक्रामकता दिखा रहा है उसमें क्या संदेश छिपा है? शायद चीन अपने आक्रामक तेवर की आड़ में अपने साथी और अपने विरोधियों पर ठप्पा लगाकर उनकी सूची बनाते हुए आगे बढ़ रहा है। ऐसा करने से उसकी भविष्य की योजनाएं आकार लेगी। सीधे शब्दों में कहें तो चीन ये देखना चाहता है कि कौन-सा ऊँट किस करवट बैठेगा। इस मायने से इतर भी कई और मायने हो सकते है। मगर सभी मायने एक ही संकेत देने का प्रयास कर रहे हैं कि चीन के इस खेल में भारत की विदेश नीति क्या होने जा रही है?
इन दिनों भारत की विदेश नीति पर गौर करें तो वह दिशाहीन-सी नज़र आ रही है। कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि भारत आने वाले दिनों में ख़ुद को कहाँ खड़ा हुआ पाएगा। जैसे- भारत चीन को समय-समय पर संकेत देने के लिए अमेरिका से हथियार की डील कर रहा है। साथ ही अमेरिका के साथ बंगाल की खाड़ी में नेवी अभ्यास भी।
भारत इस साल होने वाले मालाबार अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया को न्यौता देने पर विचार कर रहा है। जिसमें चीन के अन्य विरोधी अमेरिका और जापान पहले से ही शामिल है जिसे QUAD के रूप में जाना जाता है। चीन ग्लोबल टाइम्स में भारत के इस क़दम पर उसे परिणाम भुगतने की चेतावनी दे चुका है। क्योंकि चीन QUAD को अपने विरुद्ध बनाया गया वैसा गुट समझता है जैसा एक समय USSR के लिए NATO था।
दरअसल इस अभ्यास के सफल होने से भारत को अमेरिका से कुछ एंटी सबमरीन वारफेयर टेक्नोलॉजी मिलने की उम्मीद है। ऐसे में भारत चीन से मुकाबले की दिशा में कुछ हद तक मजबूत जरूर होगा। मगर यदि भविष्य में QUAD समूह का कोई देश अपने किसी दुश्मन को जवाब देने के लिए भारत की ओर देखेगा तो भारत क्या करेगा?
अमेरिका द्वारा जी7 के विस्तार वाले विचार में भारत की दिलचस्पी है। इस प्रस्तावित समूह में भारत का पुराना साथी रूस शामिल होगा या नहीं अभी स्पष्ट नहीं है। चीन इसे अपने विरुद्ध खड़ी हो रही एक और नई गुटबाजी के रूप में देखता है।चीन के विरोधी अमेरिका से नजदीकी के अलावा भारत अमेरिका के विरोधी रूस से भी नजदीकी बनाए हुए है। पिछले महीने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तीन दिन की रूस यात्रा पर गए। जहाँ एस-400 एंटी मिसाइल सिस्टम की जल्द डिलीवरी को लेकर बातचीत हुई।
भारत चीन की 5जी तकनीक को टक्कर देने के लिए यूके द्वारा प्रस्तावित D-10 ग्रुप में भी शामिल होने पर विचार कर रहा है। जो चीनी कंपनी हुआवे को सीधे तौर पर चुनौती है।इन नए प्रस्तावित समूहों में अमेरिका मौजूद है। और भारत का अमेरिका की ओर बढ़ता एक-एक क़दम रूस के साथ रिश्तों से जुड़े सवालों की गठरी को तैयार करता जाएगा।इन नए-नए प्रस्तावित गुटों में भर्ती होने का विचार और अमेरिका से बढ़ती नजदीकियां सवाल उठाती है कि गुट निरपेक्षता का क्या होगा? भारत के विदेश मंत्री ने पिछले दिनों द हिन्दू अखबार में अपने लेख में कहा कि भारत पूरी तरह से गुट निरपेक्ष आंदोलन को नकार नहीं सकता है। लेकिन लंबे समय तक कड़े निर्णय लेने से दूर भी नहीं भागा जा सकता है। क्या भारत इस टिप्पणी में अपनी नई विदेश नीति का उदय होता हुआ देख सकता है जो गुट निरपेक्षता की नीति को बिना त्यागे आगे बढ़ेगी? या फिर कड़े निर्णय और भारत में चीन विरोधी लहरों के दबाव में हम किसी गुट में शामिल होने जा रहे हैं?
यदि अमेरिका-चीन की आपसी तनतनी से भविष्य की तस्वीर देखने की कोशिश करें तो लगभग स्पष्ट है कि यह नए शीत युद्ध के लिए मैदान तैयार हो रहा है। इसका भविष्य अमेरिका के आगामी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने पर और अधिक स्पष्ट हो जाएगा। इस समय जो स्पष्ट है वो ये कि भारत अपने को इस संकट से अलग नहीं कर सकता है और इसी संकट के हल में भारत की विदेश नीति तय होनी है।[रीवा से लेखक विपिन तिवारी ]