ADAS Vs V2V: 2026 तक गाड़ियां आपस में करेंगी बात, V2V चिप से हादसों से पहले मिलेगा अलर्ट, 5–7 हजार बढ़ सकती है कीमत
भारत में 2026 के अंत तक नई गाड़ियों में V2V टेक्नोलॉजी अनिवार्य हो सकती है। इससे कारें एक-दूसरे को अलर्ट भेजेंगी, हादसे कम होंगे और कीमत 5–7 हजार तक बढ़ सकती है।
- 🚗 2026 के अंत तक नई गाड़ियों में V2V चिप अनिवार्य करने की तैयारी
- ⚠️ गाड़ियां खुद एक-दूसरे को भेजेंगी ब्रेक और खतरे का अलर्ट
- 🌫️ कोहरा, ब्लाइंड मोड़ और ट्रैफिक जाम में भी पहले से चेतावनी
- 💰 गाड़ियों की कीमत 5 से 7 हजार रुपये तक बढ़ सकती है
भारत की सड़कों पर हर साल लाखों हादसे होते हैं। इनमें हजारों लोग अपनी जान गंवा देते हैं। इन्हीं हादसों को कम करने के लिए सरकार अब गाड़ियों को “स्मार्ट” बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संकेत दिए हैं कि 2026 के अंत तक देश में नई गाड़ियों में व्हीकल-टू-व्हीकल (V2V) कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी को अनिवार्य किया जा सकता है। इसका मतलब यह होगा कि सड़क पर चलती गाड़ियां अब सिर्फ इंसानों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे से भी बात करेंगी।
V2V Technology क्या है? | What is Vehicle-to-Vehicle Communication
V2V टेक्नोलॉजी एक वायरलेस सिस्टम है, जिसमें हर गाड़ी में एक खास ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) लगाई जाती है। यह यूनिट आसपास चल रही दूसरी गाड़ियों को अपनी लोकेशन, स्पीड, दिशा और ब्रेक जैसी अहम जानकारियां भेजती है। जैसे ही कोई गाड़ी अचानक ब्रेक लगाती है या किसी खतरे के करीब पहुंचती है, पीछे और आसपास की गाड़ियों तक कुछ मिलीसेकंड में अलर्ट पहुंच जाता है। इससे ड्राइवर को समय रहते चेतावनी मिल जाती है और टक्कर टल सकती है।
पायलट की तरह “बात” करेंगी गाड़ियां | Cars Will Communicate Like Pilots
नितिन गडकरी ने इस सिस्टम की तुलना हवाई जहाजों से की है। जैसे आसमान में पायलट एक-दूसरे से लगातार संपर्क में रहते हैं, वैसे ही सड़क पर चलती गाड़ियां भी आपस में संवाद करेंगी। अगर आगे चल रही कार अचानक ब्रेक लगाती है, तो पीछे वाली कार को पहले ही डिजिटल चेतावनी मिल जाएगी। ड्राइवर को खतरा दिखने से पहले ही स्क्रीन या अलर्ट सिस्टम के जरिए सूचना मिल जाएगी।
कोहरे और ब्लाइंड मोड़ पर सबसे ज्यादा फायदेमंद
V2V टेक्नोलॉजी उन हालात में सबसे ज्यादा कारगर साबित होगी, जहां इंसानी आंख, कैमरा या रडार सिस्टम काम नहीं कर पाते। कोहरे में विजिबिलिटी बेहद कम होती है। ऐसे में अगर आगे वाली गाड़ी अचानक ब्रेक लगाती है, तो पीछे से आने वाली गाड़ी को तुरंत अलर्ट मिल जाएगा। ब्लाइंड मोड़ और चौराहों पर सामने से आ रही गाड़ी का सिग्नल पहले ही मिल जाएगा। अगर सड़क पर कोई गाड़ी खराब होकर खड़ी है, तो दूर से ही ड्राइवर को चेतावनी मिल सकेगी।
ADAS Vs V2V: दोनों में फर्क क्या है?
आज कई महंगी कारों में ADAS (Advanced Driver Assistance System) मिलता है। यह कैमरा और सेंसर पर आधारित होता है। ADAS वही देख सकता है, जो कैमरे के सामने है। अगर आपके आगे एक बड़ा ट्रक चल रहा है और उसके आगे कोई खतरा है, तो ADAS उसे नहीं देख पाएगा। वहीं V2V टेक्नोलॉजी कैमरे पर निर्भर नहीं करती। यह वायरलेस सिग्नल से काम करती है। ट्रक के आगे चल रही गाड़ी का अलर्ट, सिग्नल के जरिए ट्रक के पार आपकी कार तक पहुंच जाएगा। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे भविष्य की सबसे असरदार सुरक्षा तकनीक मान रहे हैं।
कितना बढ़ेगा खर्च? | Cost Impact on Vehicles
सरकार इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 5,000 करोड़ रुपये खर्च कर सकती है। हर गाड़ी में लगने वाली OBU यूनिट की कीमत 5,000 से 7,000 रुपये के बीच हो सकती है। शुरुआत में यह नियम नई कारों, बसों और ट्रकों पर लागू किया जाएगा। आगे चलकर पुरानी गाड़ियों में भी इसे अलग से लगवाना अनिवार्य किया जा सकता है। इसका असर सीधे गाड़ियों की कीमत पर पड़ेगा।
स्पेक्ट्रम और तकनीकी तैयारी
V2V सिस्टम को चलाने के लिए खास फ्रीक्वेंसी की जरूरत होती है। इसके लिए सड़क परिवहन मंत्रालय और दूरसंचार विभाग के बीच एक जॉइंट टास्क फोर्स बनाई गई है। 5.875 से 5.905 GHz बैंड में 30 MHz स्पेक्ट्रम देने पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है। साथ ही ऑटो कंपनियों के साथ मिलकर तकनीकी मानक तय किए जा रहे हैं, ताकि सभी ब्रांड्स की गाड़ियां एक-दूसरे से “बात” कर सकें।
2026 की समयसीमा कितनी चुनौतीपूर्ण?
सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को 50 प्रतिशत तक कम किया जाए। V2V इसी मिशन का अहम हिस्सा है। हालांकि 2026 तक इसे पूरी तरह लागू करना आसान नहीं होगा। अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों में वर्षों पहले स्पेक्ट्रम दे दिया गया था, फिर भी वहां यह तकनीक पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। भारत में ऑटो कंपनियों को हर मॉडल में नया हार्डवेयर लगाना होगा, टेस्टिंग करनी होगी और अलग-अलग ब्रांड्स के बीच तालमेल बैठाना होगा। यह सब समय और निवेश मांगता है।
V2V टेक्नोलॉजी कब से लागू होगी?
सरकार का लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक नई गाड़ियों में इसे अनिवार्य कर दिया जाए।
क्या पुरानी गाड़ियों में भी यह लगेगा?
शुरुआत में यह नियम नई गाड़ियों पर लागू होगा, लेकिन भविष्य में पुरानी गाड़ियों के लिए भी अलग से यूनिट लगवाने का नियम आ सकता है।
ADAS और V2V में कौन बेहतर है?
ADAS कैमरा और सेंसर पर निर्भर करता है, जबकि V2V वायरलेस सिग्नल से काम करता है। V2V उन हालात में भी काम करता है, जहां ADAS सीमित हो जाता है।
क्या इससे हादसे सच में कम होंगे?
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह सिस्टम सही तरीके से लागू होता है, तो सड़क हादसों में भारी कमी आ सकती है और हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।