सैलरी और सेविंग्स दोनों अकाउंट में ये होता है अंतर, देखें यहां

सैलरी अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट दोनों के अपने अपने फायदे होते हैं. इसे आप जरूरत के मुताबिक खुलवा सकते हैं.
सैलरी अकाउंट कंपनियों के कहने पर खोला जाता है. किसी भी संस्था के सभी कर्मचारियों को अपना सैलरी अकांउट मिलता है जिसमें हर महीने उनकी सैलरी आती है.
सेविंग्स अकाउंट कोई भी व्यक्ति खुलवा सकता है. आम तौर पर जो लोग नौकरीपेशा या सैलरीड नहीं होते हैं, वे अपने फाइनेंस को मैनेज करने के लिए सेविंग्स अकाउंट खोलते हैं.
अगर आपके पास सैलरी अकाउंट है तो आपको इसमें मिनिमम बैलेंस मैंटेन रखने कोई जरूरत नहीं होती है. सैलरी अकाउंट के साथ आपको एक निजी चेक-बुक भी मिलती है.
अगर आपका अकाउंट कम से कम दो वर्ष या इससे ज्‍यादा पुराना है तो आपको इसमें ओवरड्राफ्ट की सुविधा भी मिलती है.
ओवरड्राफ्ट रकम की लिमिट दो महीने के बेसिक सैलरी जितनी होती है. ओवरड्राफ्ट की सुविधा के तहत अगर आपके बैंक आकउंट में कोई बैलेंस नहीं है, तो भी आप एक तय लिमिट तक पैसे निकाल सकते हैं.
अगर किसी के सैलरी अकाउंट में लगातार तीन महीने तक कोई सैलरी नही आती है तो बैंक उसे जनरल अकाउंट में बदल देता है.
सभी सरकारी और निजी बैंक अपने सेविंग्स अकाउंट पर एयर एक्सीडेंट समेत लाइफ इंश्योरेंस कवर ऑफर कर रहे हैं.
सेविंग्स अकाउंट में जमा राशि पर 5 लाख रुपये तक की पूंजी पर रिजर्व बैंक कवर देता है.
सामान्य सेविंग्स अकाउंट कस्टमर्स दूसरे बैंकों के एटीएम से 10,000 रुपये और अपने बैंक से अधिकतम 25,000 रुपये ही निकाल सकते हैं.
Author : Akash dubey
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