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क्या आप जानते हैं चक्रवर्ती सम्राट अशोक का ‘रीवा’ से था ख़ास कनेक्शन, जरूर पढ़ें ये खबर…

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अपने युद्ध कौशल से दुनिया को लोहा मनवाने वाले चक्रवर्ती सम्राट अशोक जितने शूरवीर थे, उतने ही मर्मस्पर्शी भी थे। मप्र से उनका गहरा नाता था।

सतना. अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार के पुत्र व चंद्रगुप्त का पौत्र थे। युद्ध कौशल में प्रवीणता उनकी जन्मजात थी। बचपन से ही सेना की गतिविधियों सक्र्रिय थे और बाद में महान योद्धा बने। लेकिन आखंड भारत (भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार व अफगानिस्तान) में तकरीबन ४२ साल (269 ई.पू से 232 ई पू. तक) राज उन्होंंने अपने बुुद्धि कौशल के बल पर किया। जीवन काल में एक ही युद्ध लड़ा है। इसमें हुई भारी जनहानि से व्यथित होकर वे हिंसक युद्धनीति को छोड़कर धर्मविजय का रास्ता अपनाया। धीरे-धीरे धम्म उपासना की ओर आगे बढ़े और बाद में बौद्ध धर्म को पूरी तरह से आंगीकृत कर लिया। इसके प्रचार-प्रसार में इनके बेटे-बेटी भी लगे रहे। कई देशों की यात्रा की। जगह-जगह स्तम्भ व स्तूपों का निर्माण कराया। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलैंड व चीन सहित कई देशों में इन्हें अभी देखा जा सकता है।

मप्र से नाता
सम्राट आशोक का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में बताया गया है। लेकिन इनका विवाह मप्र के विदिशा में शाक्यवंशी देवी से हुआ था। बताया गया इनके बड़े भाई सुशीम लक्षशिला का प्रांंतपाल था। लेकिन यहां विद्रोह की स्थिति बनी तो आशोक को भेजा गया। इन्होंने बौद्धिक क्षमता का प्रयोग करते हुए बिना युद्ध के राज्य में शांति स्थापित की। इस बीच उज्जैन में विद्रेाह की सूचना मिली तो बिंदुसार ने अशोक को उज्जैन भेजा। तक्षशिला से उज्जैन जाते समय ये विदिशा में ठहरे थे। तभी देवी से मेल-मिलाप हुआ और बाद में शादी कर ली थी। देवी से इन्हें दो बच्चे थे। पुत्र महेन्द्रं व पुत्री संघमित्रा। हालांकि, देवी पूरा जीवन विदिशा में ही व्यतीत किया।

विंध्यक्षेत्र था प्रमुख शिक्षण केंद्र
बौद्ध धर्म के अनुयायियों का विंध्यक्षेत्र शिक्षण केन्द्र था। इसके प्रमाण रीवा जिले के देउर कोठार में मिले हैं। यह क्षेत्र कौशाम्बी से उज्जैनी अवंति मार्ग तक जाने वाला दक्षिणापक्ष का व्यापारिक मार्ग था। वर्ष 1999-2000 में यहां स्तूपों की खोज हुई। खुदाई कराई गई तो तोरणद्वार के अवशेष, मौर्यकालीन ब्राही लेख के अभिलेख, शिलापट्ट स्तंभ और पात्रखंड बड़ी संख्या में मिले। यह स्तूप परिसर भरहुत, सांची के समान ही विशाल और विकसित रहा होगा। इतना ही नही यहां हजारों वर्ष पुराने शैलचित्र वाली गुफाएं भी स्थित हैं।

सौतेले भाइयों की कर दी थी हत्या
उज्जैन में शांति कामय होने के बावजूद लोग सुशीम की शासन प्रणाली से तंग आ चुके थे। लिहाजा, उन्होंने अशोक को राजसिंहासन हथिया लेने के लिए प्रोत्साहित किया, क्योंकि सम्राट बिन्दुसार भी वृद्ध तथा रुग्ण हो चले थे। जब वह आश्रम में थे तब उनको खबर मिली की उनकी मां को उनके सौतेले भाइयों ने मार डाला, तब उन्होंने महल में जाकर अपने सारे सौतेले भाइयों की हत्या कर दी और सम्राट बने। सत्ता संभालते ही अशोक ने साम्राज्य फैलाना शुरू किया। उन्होंने असम से ईरान तक महज वर्ष में ही साम्राज्य का विस्तृत कर लिया था।

ऐसे हुआ हृदय परिवर्तन
चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष 261 ई. पू. में कलिंग पर आक्रमण किया था। आंतरिक अशांति से निपटने के बाद 269 ई. पू. में उनका विधिवत राज्याभिषेक हुआ। १३वें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में 1 लाख 50 हजार व्यक्ति बंदी बनाकर निर्वासित कर दिए गए। जबकि 1 लाख लोगों की हत्या कर दी गई थी। सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आंखों से देखा, जिससे उनका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्देेलित हो गया। यहां से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ। अन्होंने महान बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया।

राजकुल में नहीं मिला था विशेष स्थान
चक्रवर्ती अशोक सम्राट बिन्दुसार तथा रानी धर्मा का पुत्र था। लंका की परम्परा में बिंदुसार की 16 पटरानियों और 101 पुत्रों का उल्लेख है। पुत्रों में केवल तीन के नामो का उल्लेख हैं, वे हैं . सुसीम जो सबसे बड़ा था, अशोक और तिष्य। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था। एक दिन धर्मा को स्वप्न आया कि उसका बेटा एक बहुत बड़ा सम्राट बनेगा। उसके बाद उसे राजा बिन्दुसार ने अपनी रानी बना लिया। चूंकि धर्मा क्षत्रिय कुल से नहीं थी, अत: उसको कोई विशेष स्थान राजकुल में प्राप्त नहीं था। अशोक के कई (सौतेले) भाई-बहने थे।