लोकसभा में आरक्षण पर हंगामा: केंद्र ने कहा- सरकार इस केस में कभी पार्टी नहीं थी

राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय

नई दिल्‍ली: आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आज लोकसभा में विपक्षी पार्टियों का जबर्दस्‍त हंगामा देखने को मिला. पूरा विपक्ष केंद्र पर पिछड़े समुदाय के अधिकारों को छीनने का आरोप लगाने लगा. सरकार ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया. इस बीच सामाजिक न्‍याय और सशक्‍तीकरण मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार उच्‍च स्‍तरीय विचार-विमर्श कर रही है. मैं इस मामले में स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि सरकार इस केस में कभी पार्टी नहीं थी. इससे पहले अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को सरकारी नौकरी में या पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पिछले सप्ताह आए आदेश पर सोमवार को लोकसभा में काफी हंगामा हुआ और पूरा विपक्ष केंद्र पर पिछड़े समुदाय के अधिकारों को छीनने का आरोप लगाने लगा. सरकार ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया.

लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने शून्यकाल में यह मुद्दा उठाकर सरकार पर हमला किया और कहा कि वह ‘एससी और एसटी समुदाय के अधिकारों को छीन रही है’ और इसलिए वह ‘राष्ट्रवाद के बजाय मनुवाद के बारे में बात कर रही है.’ चौधरी ने पूछा, “एससी और एसटी के खिलाफ सदियों से भेदभाव होता रहा है. आजादी के बाद सरकार ने उन्हें अधिकार देने का फैसला किया. अब इस सरकार को क्या हो गया? सरकर अब एससी और एसटी के अधिकार छीनने का प्रयास क्यों कर रही है?” चौधरी ने प्रश्नकाल में भी यह मुद्दा उठाया, लेकिन तब उन्हें इस मुद्दे पर बोलने नहीं दिया गया.

कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश था और सरकार को इससे कोई मतलब नहीं था.” जोशी ने आरोप लगाया कि साल 2012 में कांग्रेस की ही सरकार थी, जब यह मुद्दा कोर्ट में पहुंचा. भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने भी लोकसभा में यह मुद्दा उठाया और उसके नेता चिराग पासवान ने कहा, “आरक्षण एससी और एसटी का संवैधानिक अधिकार है और हमारी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के सात फरवरी के आदेश को खारिज करती है.”

सुप्रीम कोर्ट ने सात फरवरी को आदेश दिया था कि आरक्षण समुदाय का मौलिक अधिकार नहीं है. उन्होंने कहा, “मैं सरकार से इस मुद्दे पर विचार करने और एससी/एसटी आरक्षण को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने का आग्रह करता हूं, ताकि इस मुद्दे का समय-समय पर उठना स्थाई तौर पर बंद हो जाए.”

डीएमके के सदस्य ए. राजा ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से एससी/एसटी के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दाखिल करने और इस कानून को 9वीं अनुसूची में डालने का सुझाव दिया. बहुजन समाज पार्टी के रितेश पांडे ने सरकार पर हमला किया और इसे दलित विरोधी बताया.

अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से इस फैसले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की, ताकि समाज के वंचित तबके के अधिकारों की रक्षा की जा सके. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की सुप्रिया सुले ने सरकार से अनुरोध किया कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे, जबकि मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने सरकार से अदालत में समीक्षा याचिका दाखिल करने की मांग की.

उत्तराखंड सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पद पर एससी/एसटी समुदाय के सदस्यों को प्रोन्नत करने के लिए आरक्षण की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सात फरवरी को कहा कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण और प्रोन्नति में आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है.

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