पीएम मोदी बोले- कुछ राजनीतिक दलों को समाज में शांति नहीं, कलह चाहिए

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नई दिल्ली/संत कबीर नगर : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (28 जून) को उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित सूफी संत कबीर दास के 620वें प्राकट्य उत्सव के मौके पर मगहर पहुंचे. वह यहां सबसे पहले संत कबीर दास की समाधि पर पहुंचे और फूल चढ़ाए. उन्होंने संत कबीर की मजार पर चादर भी चढ़ाई. उनके साथ इस मौके पर सीएम योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे. पीएम मोदी ने मगहर में 24 करोड़ की लागत से तैयार होने वाली संत कबीर अकादमी का भी शिलान्यास किया.

पीएम नरेंद्र मोदी ने यहां पर एक बार फिर से अपने चिर परिचित अंदाज में अपने भाषण की शुरुआत पुरबिया भाषा में की. उन्होंने कहा, मेरी यहां आने की इच्छा पूरी हुई. संत कबीर ने समाज को सही दिशा दिखाई. कबीर की साधना मानने से नहीं जानने से आरंभ होती है. इस मौके पर पीएम ने अमरनाथ यात्रियों को भी शुभकामनाएं दीं. पीएम मोदी ने संत के दोहों को याद करते हुए कहा, कबीर को समझने के लिए किसी शब्दकोष की जरूरत नहीं है. उनकी भाषा आपकी और हमारी सीधी साधी भाषा थी.

पीएम मोदी ने संत कबीर की सीख के सहारे, विपक्षी दलों पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा, कुछ लोग समाज में शांति नहीं कलह चाहते हैं. ऐसे लोग जमीन से कटे हुए हैं. उन्हें हकीकत का पता ही नहीं है. उन्होंने संत कबीर को पढ़ा ही नहीं.
मगहर में पीएम मोदी से पहले सीएम योगी आदित्यनाथ ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, भाजपा किसी एक धर्म या संप्रदाय की सरकार नहीं है. भारत में एक विश्वास का वातावरण बना है. बड़ी संख्या में देश में आवास बने हैं. सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ गरीबों तक पहुंच रहा है. उन्होंने कहा, सरकार गरीबों के हित में कार्य कर रही है. देश मोदी राज में तरक्की की राह पर है. सीएम योगी ने कहा, पिछले चार साल में सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा.

इससे पहले पीएम मोदी सुबह लखनऊ पहुंचे. यहां उनका स्वागत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया. इस मौके पर उनके साथ मंत्रिमंडल के दूसरे और अधिकारी भी मौजूद थे.

क्यों जाना जाता है मगहर को
संतकबीर नगर जिले में छोटा सा कस्बा मगहर वाराणसी से 200 किमी दूर है. इस कस्बे को लेकर पहले कहा जाता था कि यहां मरने वाला व्यक्ति अगले जन्म में गधा होता है या फिर नरक में जाता है. कबीर दास वाराणसी में पैदा हुए, लेकिन उन्होंने अपना अंतिम समय मगहर में बिताया था. उन्होंने पूरा जीवन काशी में बिताया, लेकिन अंतिम समय मगहर चले गए. ऐसा उन्होंने यहां के बारे प्रचलित धारणा को तोड़ने के लिए किया. 1518 में इसी जगह संत कबीर दास की मृत्यु हुई.