विंध्य क्षेत्र: विंध्य की राजनीति में पटेल हुए खेवनहार

विंध्य क्षेत्र: विंध्य की राजनीति में पटेल हुए खेवनहार

मध्यप्रदेश

विंध्य क्षेत्र: विंध्य की राजनीति में पटेल हुए खेवनहार

रीवा। विंध्य की राजनीति में अब से पहले सिर्फ दो ही केंद्र बिंदु क्षत्रिय और बाम्हण रहे हैं लेकिन वर्तमान में दोनों के सितारे गर्दिश में हैं। अब विंध्य की राजनीति में अगर देखा जाय वर्तमान में सिर्फ पटेल ही मुख्य केंद्र बिंदु हैं। वह चाहे भाजपा में हों अथवा कांग्रेस या बसपा में हैं, मुख्य भूमिका में काम कर रहे हैं।

विंध्य क्षेत्र: विंध्य की राजनीति में पटेल हुए खेवनहार

मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी तो विंध्य का नेतृत्व कमलेश्वर पटेल कर रहे थे वहीं राज्यसभा सांसद राजमणि पटेल मार्गदर्शक एवं कर्ताधर्ता का रोल अदा कर रहे थे। लगभग 15 महीने कांग्रेस सरकार रही। इसके बाद फिर भाजपा की सत्ता में वापसी हुई और फिर सबको दरकिनार करते हुए अमरपाटन विधायक रामखेलावन पटेल को मंत्री बनाकर मुख्य भूमिका में खड़ा कर दिया गया है।

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दूसरी तरफ सतना सांसद गणेश सिंह केंद्रीय राजनीति में विंध्य का चेहरा बने हुए हैं। प्रदेश से लेकर देश की राजनीतिक में पूछपरख हो रही है। तो वहीं बसपा में विकास सिंह पटेल, पंकज पटेल आदि अपना प्रभाव जमाए हुए हैं।

लंबे संघर्ष के बाद सितारों का हुआ उदय

कभी न कभी कुछ करने, आगे बढ़ने, कुछ कर दिखाने का अवसर एक बार सभी को जरूर मिलता है। आजादी से लेकर अब तक के लंबे संघर्ष के बाद विंध्य की राजनीति में पटेलों की प्रभावपूर्ण राजनीतिक उदय हुआ है। ऐसा नहीं है कि पहले राजनीति में उनकी भागीदारी नहीं थी लेकिन प्रभावहीन थे।

कोई महत्व नहीं रहा। लेकिन वर्तमान में उनका पूरा बर्चस्व है। पूरे विंध्य में डंका बजाने की कोशिश में आगे कदम बढ़ रहे हैं। बल्कि राजनैतिक विरासत वाले नेता गर्दिश में हैं। प्रभावहीन होकर सिर्फ हवेली तक सीमित होकर रह गए हैं। उनका भविष्य भी उज्जवल नहीं दिख रहा है।

कुंद हुई राजनैतिक धार

जैसा कि लोगों ने सोचा था कि स्व. कुंवर अर्जुन सिंह एवं स्व. श्रीनिवास तिवारी के अवसान के बाद विंध्य से ब्राम्हण-ठाकुर की राजनीति का पराभाव हो जाएगा, वैसे ही आगे होता दिख रहा है। विंध्य की राजनीति की धार कुंद हो गई है। दोनों ही घरानों के वारिस राजनीति में प्रभावहीन होते जा रहे हैं। तो दूसरी तरफ अन्य नेता भी शून्य होते जा रहे हैं। आगे का सभी राजनीतिक दृष्टि से ठीक नहीं है।

जो ब्राम्हण और ठाकुर नेता हैं वह भी बैठे-बैठाए सब कुछ हासिल करना चाहते हैं जो अब संभव नहीं है। उन्हें यह अच्छी तरह जान लेना होगा कि बिना संघर्ष के कुछ मिलता नहीं है। जो कुछ मिल भी गया है उसमें तुम्हारा कोई योगदान नहीं रहा बल्कि महापुरुषों की कृपा के कारण ही मिला है। अब संघर्ष करने और कुछ अपने दम पर हासिल करने का समय आ गया है जिसकी काबिलियत नहीं दिख रही है।

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