सोनांचल महोत्सव में लोक कलाओं की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए लोग

सोनांचल महोत्सव में लोक कलाओं की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए लोग

मध्यप्रदेश रीवा सीधी

सोनांचल महोत्सव में लोक कलाओं की झांकी देख मंत्रमुग्ध हुए लोग

रीवा। सीधी जिले में गत दिवस सोनांचल महोत्सव का आयोजन किया गया जहां लोक कलाओं की सुंदर प्रस्तुति देकर उपस्थित जनसमूह का कलाकारों ने मनमोह लिया तथा अतीत की यादों के साथ ही कलाओं की ओर आकर्षित किया। सोनांचल महोत्सव में अहिरहाई लाठी, काली खप्पर, अहिरहाई शैला, लकड़बग्घा, कर्मा, लोकनृत्य एवं संस्कार गीत, भगत, लोकगीतों की भी प्रस्तुति दी गई।

लोक कला के आयोजन में इंद्रवती नाट्य समिति के संचालक नीरज कुंदेर, रोशनी प्रसाद मिश्रा, नारेन्द्र बहादुर सिंह योगदान रहा। कार्यक्रम में संस्कृत मंत्री उषा ठाकुर, विधायक शरदेंदु तिवारी, कुंवर सिंह सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं आमजन उपस्थित रहे।

गुदुम बाजा, शैला नृत्य का प्रदर्शन

लोकरंग कार्यक्रम में जिले के ग्राम बकवा के कलाकारों नें अद्भुत गुदुम बाजा का प्रदर्शन किया। जिसमें लाल बहादुर घांसी, तेजबली घांसी, सूर्यबली घांसी, रामप्रसाद घांसी, जगनाथ घांसी, रापमन घांसी, गया प्रसाद घांसी, रंगनाथ घांसी, दानबहादुर घांसी, मिठाईलाल घांसी सहित अन्य शामिल रहे। इस नृत्य को लेकर मान्यता है कि शिव विवाह के दौरान इस नृत्य की शुरुआत हुई थी।

शिव विवाह के दौरान अलग-अलग कबीलों व समुदायों द्वारा करतब का प्रदर्शन किया गया था कलांतर में वही करतब प्रधान कला घसिया समुदाय में नृत्य रूप में विकसित हुई। वहीं शैला नृत्य बघेलखण्ड क्षेत्र में गोंड जनजाति द्वारा प्रमुखता से किया जाने वाला नृत्य शैला नृत्य है।

शैला नृत्य में पुरुष लकड़ी के दो छोटे डंडे को हाथ में लेकर अपने जोड़ी के डंडे पर अघात कर करते हैं, शैला नृत्य के संबंध में लोक मान्यता है कि यह युद्ध विधा है जो बाद में नृत्य रूप में विकसित हुई है।

अहिरहाई लाठी नृत्य देखकर मंत्रमुग्ध हुए दर्शक

सोनांचल महोत्सव में जिले के लोक कलाकारों नें अहिरहाई लाठी नृत्य का मनमोहक प्रदर्शन किया। जिसे देखकर दर्शक मनमुग्ध हो गए। जिसमें बुद्धसेन यादव, रामदास यादव, राजकुमार यादव, रामनरेश यादव, धनुधघारी बैगा, लक्षधारी बैगा, छोटेलाल साकेत, केमला प्रसाद साकेत, कलई घांसी, आदि शामिल रहे।

विन्ध्य का सबसे मनमोहक नृत्य अहिरहाई-लाठी है जो बघेलखण्ड में निवास करने वाले अहीर यादव समुदाय द्वारा जातिगत कला रूप को अहिराई नृत्य कहते है। अहिराई शब्द अहीर जातीय नाम से पड़ा है,बघेलखण्ड क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में इसे बरेदी नृत्य, गहिरा नृत्य, धनगर नृत्य आदि नामो से जाना जाता है।

इस नृत्य में बिरहा गायन, दोहे के साथ महिला और पुरुष दोनों समवेत रूप से नृत्य करते हैं। अहिराई नृत्य मात्र जातीय नृत्य नहीं बल्कि यादव जाति की सांस्कृतिक पहचान है। यादव समाज जब हाथ में डंडा लेकर लाठी के युद्धरूप को तालबद्ध होकर लयपूर्ण शारीरिक गति के साथ करता है उसे अहिराई-लाठी कहते हैं।

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