रीवा में हो रही रिश्तों की हत्याएं, हर दिन दिया जा रहा जघन्य वारदातों को अंजाम...

रीवा में हो रही रिश्तों की हत्याएं, हर दिन दिया जा रहा जघन्य वारदातों को अंजाम…

मध्यप्रदेश रीवा

रीवा। वर्तमान परिवेश में देखा जा रहा है कि आपसी वाद-विवाद दिन प्रतिदिन हो रहे हैं और छोटी-मोटी बातों को लेकर विवाद इतना आक्रांत हो जाता है कि हत्या जैसी जघन्य वारदात हो जाती हैं।

ऐसे विवादों से जहां रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। भाई-भाई का सिर कलम कर रहा है। मामा-भांजी को मौत के घाट उतार रहा है। अबोध मासूमों को नहीं बख्शा जा रहा है। माता, पिता, भाई, बहन जैसे रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। छोटे-मोटे घरेलू विवादों को लेकर हत्या जैसी वारदात को अंजाम दिया जा रहा है।

अभी हाल ही में चोरहटा थाना अंतर्गत दादर गांव में दो भाइयों के बीच आपसी विवाद में छोटे भाई और भयाहू की हत्या कर दी गई। ऐसी अनेक वारदातें प्रतिदिन हो रही हैं। टुकड़े-टुकड़े कर मानव शरीर को नदी-नालों में फेंका जा रहा है। लेकिन पुलिस प्रशासन ऐसी वारदातों को रोकने में अक्षम साबित हो रहा है। वहीं सरकार भी वारदातों को रोकने कोई पहल नहीं कर रही है। सामाजिक संगठन भी फिजूल की बातों में उलझे रहते हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर ऐसे प्रयास नहीं हो रहे जिससे विवादों को रोका जा सके।

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क्या कारण हैं

विवादों के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जो सामने आ रहा है उसमें आम लोगों के बीच आपसी प्रतिद्वंदिता बढ़ती जा रही है। अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा दिखाने की मानसिकता विवाद के कारण बन रहे हैं। हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। किसी को मन से बड़ा मानने को तैयार नहीं हैं। दिखावती और बनावटीपन ज्यादा ही बढ़ गया है। दरअसल हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि हम छोटे को भी छोटा नहीं स्वीकार रहे हैं। यदि हमारी स्वीकारोक्ति हो जाय तो विवाद अपने आप समाप्त हो जायेगा। हम बड़ा सिर्फ धन-संपदा को समझने लगे हैं और बुद्धि-विवेक को कुछ मानते ही नहीं। यही कारण है कि जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं और हम अंदर ही अंदर हाय करके रह जाते हैं।

रीवा में हो रही रिश्तों की हत्याएं, हर दिन दिया जा रहा जघन्य वारदातों को अंजाम...

रोका जा सकता है?

ऐसा नहीं है कि अपराध रोका नहीं जा सकता है। लेकिन अकेले कोई नहीं रोक सकता है। सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। तब समाज में बढ़ते अपराध को बड़ी आसानी से रोका जा सकता है। शासन-प्रशासन के साथ ही हर नागरिक को थोड़ा प्रयास करना होगा। यदि शासन स्तर पर गांवों में सामाजिक संगठन बनाए जाय तथा उन्हें लोगांे में जागरुकता लाने का दायित्व सौंपा जाय। सामाजिक संगठनों को सुरक्षा प्रदान की जाय तथा गांवों में होने वाले विवादों की जानकारी संगठन के लोग जुटाने का प्रयास करें तथा उनका निराकरण निष्पक्षता पूर्ण कराएं। यदि उनके स्तर से विवाद हल नहीं हो सके तो फिर पुलिस-प्रशासन को इसकी जानकारी उपलब्ध कराएं। शासन को भी अवगत कराएं। शासन की निगरानी में कड़ाई करते हुए पुलिस-प्रशासन कार्रवाई कर विवादों का पटाक्षेप करा सकती हैं।

पुलिस निष्क्रियता से बढ़े विवाद

वैसे ज्यादातर विवादों में जो बात सामने आती हैं उसमें यही होता है कि पीड़ित पुलिस थाना में कई बार शिकायत कर चुका है लेकिन पुलिस ने अनसुना कर दिया और उसका अंजाम बुरा हो जाता है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि अधिकतर विवाद पुलिस की निष्क्रियता के कारण हो रहे हैं। जबकि पुलिस विभाग सिर्फ काम ही यही है कि नगर क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम रहे। लेकिन पुलिस अशांति-उन्माद की स्थिति निर्मित होने पर सक्रिय होती है। पहले वह निद्रा में रहती है। यही कारण है कि घटनाएं होती रहती हैं, इसके बाद पुलिस अपने कर्तव्य की इतिश्री एपफआईआर करके करती है।

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