REWA : कांग्रेस को दस का दम, 19 पर जोर आइमाइश1 min read

Madhya Pradesh

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस
03 सीटों पर एक लाख से कम वोटों से हारी
09 सीटों पर एक से दो लाख के बीच की हार
07 सीटों पर दो से तीन लाख के बीच की हार
जितेन्द्र चौरसिया, भोपाल. कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में ‘दस के दमÓ पर भरोसा है। बाकी 19 सीटों पर मुकाबला कड़ा होगा। दरअसल, पार्टी ने 2014 के चुनाव में जीत और कम वोट के अंतर से हार के आधार पर सीटों की व्यूहरचना तैयार की है। आसान 10 सीटों में मौजूदा तीन सीटों के साथ कम अंतर से हार वाली सात सीटें शामिल हैं। मोदी लहर में इन सीटों पर कांग्रेस के दिग्गज हार गए थे। इस बार कोई लहर नहीं है। 15 साल बाद प्रदेश की सत्ता में वापसी से सियासी समीकरण भी बदले हैं।
– एक लाख से कम हार वाली सीटें
सतना : कांग्रेस प्रत्याशी अजय सिंह भाजपा के गणेश सिंह से महज 8688 वोट से हारे थे। कांग्रेस की यह सबसे कम अंतर की हार थी। अजय सीधी से टिकट मांग रहे थे, लेकिन उन्हें सतना से लड़ाया गया था। इस बार इन दोनों सीटों से उनका दावा मजबूत है। पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह भी तगड़े दावेदार हैं।
ग्वालियर : कांग्रेस प्रत्याशी अशोक सिंह भाजपा प्रत्याशी नरेंद्र सिंह तोमर से 29699 वोट से हारे थे। इस बार यहां से अशोक के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शिनी राजे का नाम प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है। यहां तोमर के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी भी है, इसलिए कांग्रेस को इस सीट पर काफी उम्मीदें हैं।
बालाघाट : भाजपा प्रत्याशी बोध सिंह भगत से कांग्रेस की हिना कांवरे 96041 वोट से हारी थीं। अब हिना विधानसभा उपाध्यक्ष बन हैं। यहां पवन कांवरे सहित अन्य दावेदार हैं। उधर, बोध सिंह की स्थिति कमजोर है, इसलिए पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन अपनी बेटी मौसम के लिए टिकट मांग रहे हैं। कांग्रेस यहां भी काफी उम्मीद है।

– सवा लाख से कम वोटों से हार वाली सीटें
धार : कांग्रेस प्रत्याशी उमंग सिंघार 104328 वोट से हारे थे। भाजपा प्रत्याशी सावित्री ठाकुर जीती थीं। उमंग विधानसभा चुनाव जीतकर मंत्री बन गए हैं। वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन कांग्रेस इस सीट को अपने लिए मजबूत मानती है, क्योंकि सावित्री को लेकर एंटी इंकम्बेंसी के हालात हैं।
सीधी : भाजपा प्रत्याशी रीति पाठक 108046 वोट से जीती थीं। कांग्रेस प्रत्याशी इंद्रजीत कुमार हार गए थे। इंद्रजीत का निधन हो चुका है और उनके बेटे कमलेश्वर प्रदेश में मंत्री बन गए हैं। यहां से पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की तगड़ी दावेदारी है। कांग्रेस यहां दलबदल का दांव भी खेल सकती है, क्योंकि यहां बसपा की स्थिति अच्छी है।
मंडला : भाजपा प्रत्याशी फग्गन सिंह कुलस्ते 110469 वोट से जीते थे। कांग्रेस के ओंकार सिंह मरकाम हार गए थे। इस आदिवासी सीट पर कांग्रेस को काफी उम्मीद है। ओंकार प्रदेश में मंत्री हैं। यहां कांग्रेस के पास आधा दर्जन उम्मीदवार है। यहां मुख्यमंत्री कमलनाथ का भी प्रभाव काम करता है।

– यहां गणित उपचुनाव से बदला
शहडोल : 2014 में भाजपा के दलपत सिंह 241301 वोट से जीते थे। कांग्रेस से राजेश नंदनी सिंह की हार हुई थी। इनका निधन हो चुका है। दलपत के निधन के बाद भाजपा ने ज्ञान सिंह को मंत्री पद से इस्तीफा दिलवाकर 2016 में ये सीट फिर से हथिया ली। वे 60383 वोट से जीते थे। उपचुनाव में कांग्रेस से हिमाद्री सिंह हारीं। हालांकि, हार का अंतर 60 हजार तक आ गया, इसलिए कांग्रेस को यहां ज्यादा उम्मीद है। ज्ञान के खिलाफ एंटी इंकम्बैसी भी है।
रतलाम : 2014 में भाजपा प्रत्याशी दिलीप सिंह भूरिया ने 108447 वोट से कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया को हराया था। दिलीप के निधन के बाद 2015 में हुए उपचुनाव में कांतिलाल ने भाजपा की निर्मला भूरिया को 88832 वोट से हरा दिया। मोदी सरकार के आने के बाद यह देश में पहला उपचुनाव था, जिसमें भाजपा को शिकस्त मिली। कांग्रेस इस सीट को मजबूत मानती है।
– ये दो सीट पहले से प्लस प्वॉइंट
गुना-छिंदवाड़ा : 2014 में गुना और छिंदवाड़ा सीट ही कांग्रेस ने जीती थीं। गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया और छिंदवाड़ा से कमलनाथ जीते थे। अब कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं। उनके पुत्र नकुलनाथ का छिंदवाड़ा से चुनाव लडऩा लगभग तय है। सिंधिया और उनकी पत्नी प्रियदर्शनी राजे गुना से प्रमुख दावेदार हैं। सिंधिया को उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के साथ आधी सीटों का प्रभार मिला है, इसलिए वे वहां व्यस्त हैं। ऐसे में प्रियदर्शनी ने यहां मैदान संभाल रखा है। ये दोनों सीटें कांग्रेस का अभेद्य गढ़ मानी जाती हैं।
– ये भी कमजोर कडिय़ां
कांग्रेस सागर, भिंड और रीवा को भाजपा की कमजोर कड़ी मानती है। वजह ये कि मोदी लहर में सागर में 120737, भिंड में 159961 और रीवा में 168726 वोट से कांग्रेस की हार हुई थी। भिंड में तो भागीरथ प्रसाद के ऐन मौके पर कांग्रेस छोड़कर भाजपा जाने का नुकसान पार्टी को हुआ था। अब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा में जीत का फायदा पार्टी को मिलने की उम्मीद है।

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