मध्यप्रदेश : फिर बनेगी भाजपा की सरकार, लेकिन हार जाएंगे ये दिग्गज नेता

Madhya Pradesh
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भोपाल। मध्यप्रदेश में सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल बनने के बाद कई सीटें कम होने का अनुमान है, जबकि कांग्रेस पार्टी बदलाव का नारा देकर चुनाव जीतने की आस लगाए बैठी है। भाजपा ने 15 साल पुराने दिग्विजय शासन काल की लोगों को याद दिलाकर वोट मांगे थे, जबकि भाजपा अपने 15 सालों के विकास कार्यों का हवाला भी देती हुई नजर आई है। हालांकि किस पार्टी की कवायद कितनी सफल रही यह 11 दिसंबर को होने वाली मतगणना में सामने आ जाएगा।

इस बार बदले हैं हालात

मीडिया में चल रहे विश्लेषण के मुताबिक मध्यप्रदेश में 2013 के चुनाव में भाजपा को धमाकेदार जीत मिली थी। यह शिवराज सरकार की तीसरी लगातार जीत थी।
-एक बार फिर शिवराज सिंह अपनी सरकार को जिताने के लिए मेहनत कर रहे हैं। इस बार हालात बदलाव की तरफ भी नजर आ रहे हैं।
-इस बार शिवराज के खिलाफ कांग्रेस ज्यादा मुखर है। शिवराज थोड़े घिरते हुए नजर आ रहे हैं। किसान, युवा, महिला, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर शिवराज घिरे हैं।
-कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि उसने बदलाव का नारा देकर भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा दी है।

हार सकते हैं बीजेपी के दिग्गज नेता
कई मुद्दों पर घिरे रहने के बावजूद भाजपा इस बार फिर से सत्ता में आ सकती है, हालांकि उसके कई दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ेगा, वहीं कई सीटें कम भी हो सकती है, लेकिन देरसबेर बीजेपी फिर से सत्ता पर काबिज हो सकती है।

वोट प्रतिशत बढ़ने का फायदा भाजपा को
मध्यप्रदेश में इस बार हुए अधिक वोटिंग को सभी दल सत्ता पक्ष के खिलाफ मानकर चल रहे हैं। जबकि भाजपा इसे अपने पक्ष में मानती है। इस बार 75 प्रतिशत वोटिंग से भी सभी दल अपने-अपने गणित लगा रहे है। विपक्षी दल मानता है कि अधिक वोटिंग होना मतलब सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकंबेंसी) हावी हो गई है। ऐसे में माना जाता है कि विपक्ष को फायदा मिलता है। लेकिन, ज्यादा वोटिंग को इसका सबूत नहीं माना जाता है कि एंटी इनकंबेंसी का दौर चल रहा है।
-यदि पिछला अनुभव देखें तो वोट प्रतिशत बढ़ने का फायदा भाजपा को ही मिला है।

आंकड़ों में देखें किसे कितना फायदा
-इससे पहले मई 2014 के बाद जिन 10 राज्यों में ज्यादा वोटिंग हुई है, वहां भाजपा को सात प्रदेशों में लाभ हुआ।
-2009 के चुनाव में महाराष्ट्र में 60 फीसदी मतदान हुआ। 2014 में 64 हुआ। इसका फायदा भाजपा को ही मिला। बहुमत के आंकड़े से 22 सीट कम होने के बावजूद कांग्रेस को हरा कर सरकार बनाने में सफल रही।

-हरियाणा में 2009 में 72.29 फीसदी वोटिंग हुई, जबकि 2014 में 76.9 प्रतिशत। यहां भी भाजपा ने अपने दम पर सरकार बना ली।

-2014 में झारखंड में भी ऐसा ही हुआ। वोटिंग प्रतिशत 6.5 फीसदी बढ़ गया और। 66.03 प्रतिशत का लाभ भाजपा के ही खाते में गया।
-2014 में जम्मू-कश्मीर में भी कुछ ऐसी ही कहानी दोहराई गई। 2008 में 60.04 प्रतिशत, 2014 में 65.23 फीसदी प्रतिशत पहुंच गया। हालांकि यहां किसी को बहुमत नहीं मिला। बाद में गठबंधन के साथ भाजपा ने ही सरकार बनाई।

इन आंकड़ों को भी देखें
-कम वोटिंग में भाजपा की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
-गुजरात चुनाव के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। साल 2017 में बीजेपी को 16 सीटों का नुकसान हो गया। साल 2012 में भाजपा को यहां 115 सीटों पर जीत मिली थी।
-2017 में ये संख्या घटकर 99 पर आ गई थी। गुजरात चुनाव में 3 प्रतिशत वोटिंग कम हुई थी। 71.32 फीसदी से ये आंकड़ा 68.41% पर आ गया था।

तो फिर बन सकती है भाजपा सरकार
पिछले अनुभव के अनुसार यदि ट्रैंड रहा तो मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बन सकती है और शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगे।

एस्ट्रोसिटी एक्ट दे सकता है चकमा
इधर, एस्ट्रोसिटी एक्ट भी शिवराज सरकार को गच्चा दे सकता है। एससीएसटी सीटों पर भाजपा को 47 में से 31 सीटें मिली थी। लेकिन आज के हालात में एससीएसटी एक्ट के कारण भाजपा को नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा शिवराज सिंह चौहान का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता है। इस बयान के बाद सवर्ण शिवराज सिंह से काफी खफा हो गए हैं। इसलिए यह लोग भी शिवराज सरकार को झटका दे सकते हैं। इसके अलावा बागी उम्मीदवारों के कारण भी भाजपा को दिक्कतों का सामना करना पड सकता है उसके कई दिग्गज नेता चुनाव हार सकते हैं।

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