…वो 35 सीटें जो MP के चुनावी नतीजों पर डालेंगी असर, भाजपा-कांग्रेस दोनों को ख़तरा, पढ़ें पूरी खबर…1 min read

Assembly Election 2018 Bhopal Gwalior Madhya Pradesh National
Madhya Pradesh Assembly Elections 2018: मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 सीटों के लिए 28 नवंबर को मतदान होगा। एससी-एसटी एक्ट और सवर्ण समाज के विरोध के बीच दोनों दवलों के लिए करो या मरो जैसी स्थिति है।

इस दफा मध्य प्रदेश की लड़ाई दिलचस्प है। 230 सदस्यों वाली विधानसभा में बीजेपी एक बार फिर कमल खिलाने की तैयारी में है। इसके साथ ही कांग्रेस के लिए भी ये चुनाव इसलिये अहम है क्योंकि उसकी जीत और हार से वो अागे की रणनीति में बदलाव कर सकेगा। जहां एक तरफ शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा है वहीं कांग्रेस नेताओं के लिए भी चुनौती है कि वो किस तरह से इस चुनाव के जरिए अपने कार्यकर्ताओं में जोश भर सकेंगे। इन सबके बीच दोनों दलों के वो 35 सीटें भी अहम है जो या तो उन्हें भोपाल जाने देगी या फिर अगले पांच साल का इंतजार करना होगा।

चुनावी समर में 35 सीटें अहम
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 35 सीटें आरक्षित हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की झोली में 28 सीटें आई थीं। जानकार बताते हैं कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग के मतदाता जीत या हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2013 या उससे पहले के चुनाव में परंपरागत तौर पर सवर्ण मतदाता बीजेपी के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। लेकिन इस दफा तस्वीर अलग है। एससी-एसटी एक्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का जब फैसला आया तो विपक्षी दल निशाना साधने लगे की मौजूदा केंद्र सरकार दलितों और उपेक्षित समुदात के प्रति संवेदनशील है।

अब नजर डालते हैं मध्य प्रदेश की उन पांच सीटों पर जहां एससी-एसटी वोटों का प्रतिशत 30 फीसद से ज्यादा है। देवसर में 47 फीसद, परसिया में 45 फीसद, आमला, गोटेगांव और माहेश्वर में 41 फीसद मतदाताओं का संबंध एससी-एसटी से हैं। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर सामान्य, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के मतदाता महत्वपूर्ण निभाएंगे।

एससी-एसटी एक्ट, सवर्ण समाज और केंद्र सरकार
बैकफुट पर आते हुए केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला किया। केंद्र सरकार ने एससी-एक्ट को अध्यादेश के जरिए कड़ा कर दिया। लेकिन उसका सवर्ण समाज के विरोध के रूप में सड़कों पर देखने को मिला। हिंदी हार्टलैंड के यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश सुलग उठा। सवर्ण समाज के लोग कहने लगे कि ये काले कानून की तरह है और इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

विंध्य एवं चंबल में गूंजे थे विरोध के सुर
मध्य प्रदेश में खासतौर पर विंध्य के रीवा संभाग एवं चंबल संभाग के मुरैना, भिंड और ग्वालियर में विरोध के सुर कुछ ज्यादी ही सुनाई दिए। ऐसे में जानकारों का कहना है कि बीजेपी के लिए सवर्णों को गुस्से पर काबू पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इसके साथ ही जानकार ये भी बताते हैं कि कांग्रेस के लिए भी जवाब देना आसान नहीं होगा। क्योंकि वो भी खुलकर अध्यादेश लाए जाने समर्थन करती रही।


Facebook Comments