विकासपुरूष के रूप में बनाई अपनी पहचान, अब विपक्ष ढूढ़ रहा इनके टक्कर का...



रीवा (आर्यन द्विवेदी)। प्रदेश के जाने माने संविदाकार स्व. भैयालाल शुक्ल के छोटे पुत्र। सिविल से इंजीनियरिंग की शिक्षा पूर्ण करने के बाद राजनीति के मैदान में कूदने वाले ये शख्स कोई और नही रीवा की धरती में जन्मे प्रदेश के खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल हैं।

जब इन्होने अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत की तब विन्ध्य में दो ही कद्दावर नेता थें, एक केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह और दूसरे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीयुत निवास तिवारी। इन दोनो ही नेताओं की धाक ऐसी कि हर कोई कहता इन्हे कोई हरा नही सकता। हांलांकि राजनीति के मैदान में हार जीत का मुंह तो सबको देखना पड़ता है, पर दोनो ही कद्दावर नेता को उनकी राजनीति की विरासत सम्हालने वाले मिल गए। 

बात रीवा की करें तो रीवा में पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी होती है। रीवा प्रदेश की राजनीति का समीकरण बनाने बिगाड़ने में काफी प्रभावी होता है। श्री तिवारी के अलावा रीवा में ऐसा कोई नेता होगा शायद ही उस वक्त किसी ने सोचा हो। पर एक गैरराजनीतिक परिवार में जन्मे एक संविदाकार के पुत्र ने सभी की सोच को गलत साबित करने में मजबूर कर दिया। हालात यह है कि तीन पंचवर्षीय से विधानसभा चुनाव जीत रहे इन नेता का विपक्ष तोड़ भी नही ढूढ़ पा रही है। सारे हथकण्डे अपना लिए आखिर इनके सामने चुनाव लड़ाए तो लड़ाए किसे?

रीवा विधानसभा से विधायक एवं शिवराज के मंत्रीमण्डल में बतौर खनिज मंत्री जनता की सेवा कर रहे इन नेता की पहचान अब विकासपुरूष के रूप में बन चुकी है। संविदाकार के इस पुत्र को जब रीवा की बागडोर मिली तब तक रीवा में करने के लिए बहुत काम था, यू तो रीवा ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्यों जैसे उंचे तब्के के लोगों का क्षेत्र है, पर विकास आदिवासी क्षेत्रों से भी गया गुजरा, न चलने के लिए सड़कें, न पीने के लिए मीठा पानी, न बिजली और न ही कोई साधन। इंजीनियर शुक्ल ने इस काम को अपने जिम्मे लिया और लग गए रीवा को एक नई पहचान दिलाने में। तबसे न ये रूकें न इसके द्वारा कराए जा रहे विकास के काम। 

अब बात करते हैं 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव की। चुनाव की तैयारियां लगभग शुरू हो चुकी है। तीन पंचवर्षीय से हार का मुख देख रही कांग्रेस पाटी अपने जीत के समीकरण बनाने लगी है। कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया होंगे यह भी लगभग तय हैं। पर विन्ध्य के रीवा में राजेन्द्र शुक्ल का सामना कौन करेगा, यह अब भी कांग्रेसियों का सर चकरा देने वाला सवाल है।

आईये बात करते हैं कुछ चेहरों की जो लोगों में चर्चा का विषय हैं...

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अभय मिश्र
राजनीति के गलियारे में चर्चा है कि राजेन्द्र शुक्ल के खिलाफ इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष रीवा अभय मिश्र कांग्रेस पाटी से खड़े होंगे। दरअसल साल भर पूर्व नेता प्रतिपक्ष राहुल सिंह के साथ अभय मिश्र की एक तस्वीर काफी वायरल हुई थी, एवं जिला पंचायत अध्यक्ष की उन्ही की पार्टी से पटरी भी कम ही खाती है। उन्हे पार्टी से निलंबित भी किया जा चुका है। पत्नी सेमरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायिका हैं, पर वे भी सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार से ज्यादा खुश नजर नही आती। श्री मिश्र भी जमीनी स्तर के राजनेता के तौर पर जाने जाते हैं।

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कविता पाण्डेय
कांग्रेस पार्टी के नेता एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी की भतीजी कविता पाण्डेय ने राजनीति के मैदान में अपनी छवि खुद बनाई है। श्रीमती पाण्डेय लोगों के बीच खासकर युवावर्ग के बीच काफी लोकप्रिय हैं। राजनीति के मैदान में हमेशा एक्टिव रहने वाली कविता पाण्डेय महापौर के चुनाव में निर्दलीय चुनाव लड़कर महज कुछ वोटों के अंतर से हारी थी, एवं निर्दलीय होने के बावजूद भी कांग्रेस से कहीं अधिक वोट मिले थें। फिलहाल कविता पाण्डेय की चुनावी तैयारी भी विधानसभा के तौर पर देखी जा रही है। श्रीमती पाण्डेय के कांग्रेस में घर वापसी के बाद अगर पार्टी के आलाकमान जमीनी स्तर एक्टिव राजनेता चाहेंगे तो इन्हे इग्नोर करना मुश्किल होगा। 

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राजेंद्र शर्मा
स्वच्छ छवि एवं रीवा के जाने माने संविदाकार राजेन्द्र शर्मा। राजेन्द्र शर्मा को कांग्रेस के क्लीन नेता के रूप में जाना जाता है। इनकी पहचान कांग्रेस के शासनकाल में बने शिल्पी प्लाजा के संविदाकार के रूप में होती है। हांलाकि इनके संबंध में राजनीति से परे विकास की सोच रखने वाले लोगों का मानना है कि अगर ये और राजेन्द्र शुक्ल एक साथ हो जाएं तो रीवा चौतरफा विकास की गाथा लिख डालेगा। 

गुटबाजी से कांग्रेस पार्टी के हालत खराब
बता दें कांग्रेस पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक गुट ही गुट हैं, इस बात से कोई अनजान नहीं है, चुनाव में गुटबाजी और आपसी मतभेद समझ आता है पर इस पार्टी में हर वक़्त गुटबाजी ही नज़र आती है. इन्हें एकराय कर पाने में पार्टी आलाकमान अब तक कामयाब नहीं हो पाएं हैं, और अब फिर से चुनाव नजदीक है। 

हांलांकि कांग्रेस का उदय ही गुटबाजी से हुआ है। यही कारण है कि श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी के बाद कोई भी नेता कांग्रेस में अपनी जड़ जमा पाने में सफल नही हो पाया है। गुटबाजी सिर्फ विन्ध्य में ही नही देश और प्रदेश स्तर तक विन्ध्य के हर कांग्रेस नेता को कोई न कोई पकड़ वाला नेता है, यही वजह है कांग्रेस जमीनीस्तर पर कभी एकराय नही हो पाती। वहीं भाजपा में अंदरूनी कलह भले हो लेकिन वह बाहर निकलकर फिलहाल नही आई है। अगर किसी ने उंची आवाज में बोलने की कोशिश भी की तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। फिलहाल कांग्रेस पाटी जहां दमदार चेहरे की तलाश में हैं वहीं भाजपा राजेन्द्र शुक्ल पर ही पूरा भरोसा करती है। 

बहरहाल रीवा की जनता अब समझ चुकी है की उसे राजनीति नहीं अब विकास चाहिए । जो विकास करेगा वही उनका नायक होगा, चाहे वह भाजपा का हो या कांग्रेस का या फिर किसी अन्य पार्टी का हो।

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